
आगरा। कभी आगरा के किले में जाइए, जो उत्तर भारत की सत्ता का केंद्र हुआ करता था, तो आज भी उसकी दरो-दीवारें, हर ओर मुगलिया वास्तुकला की निशानी लाल पत्थर... कुछ सफेद संगमरमर में जड़िचत रंगीन नगीने, और नक्काशियां, खूबसूरत पर अब थोड़ा वीरान से हो गये फव्वारे, सैर के लिए बाग़, सहेजी हुई पर काफी खंडहर-सी होती हुई न जाने कितनी इमारतें--- जैसे एक-एक चीज़ बात करता हुआ इतिहास का एक पन्ना हो. वो इतिहास जो कभी मुस्कुराता है, गुनगुनाता है, कभी डराता है और कभी आक्रोशित करता है. पर, सत्ता या राजनीति गौरवान्वित नहीं करती हम जैसे लोगों को, न तब करती थी, न अब करती है।
किले के दीवान-ए-ख़ास में शाही दरबार लगा था. इत्र की महक से सभा खुशनुमा थी. पारिजात, गुलाब और गेदें की पंखुड़ियों से सजावट भी हुई थी, जिनकी खुशबू अलग ही महसूस की जा सकती थी। बिन मौसम के इन फूलों का इंतजाम न जाने कैसे किया गया होगा। जिस रास्ते से शाही सवारी को आना था, उस पर सुर्ख लाल रंग के कालीन बिछे थे. तब मुग़ल साम्राज्य में ईरान और अफगानिस्तान के नायाब गलीचे पसंद किये जाते थे। कुछ तो वहाँ के शाही खानदान से तोहफों में आते थे और कुछ बड़े व्यापारी विक्रय करने लाते थे। कई बार उन्हें उनकी जायज कीमत के साथ मुंह माँगा इनाम भी बख्शीश में मिल जाता था।
सम्राट नूरुद्दीन के सभा में आगमन की खबर आई। सब अपने-अपने स्थान से उठ खड़े हुए। दोनों हाथ पीछे बांधे दरबारियों की कतारें शाही सेना के अनुशासन को भी शर्मिंदा करने को आमादा थी। जनता में से बिना किसी कड़े पैमाने के चयन किये हुए यह दरबारी, जिनका सीना कुछ घमंड और कुछ अभिमान से तना रहता था, अपने राजा के समक्ष झुक कर सलाम बजा रहे थे। स्वाभिमान की कीमत कौड़ियों की थी वहां, सब जानते थे। और कोई चुनौती क्यूँ दे! वह अलग बात है कि हुज़ूर नुरुद्दीन या तो उन अदब से झुके हुए राजदरबारियों की तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहे थे, या वह इस स्थिति में ही नहीं थे कि उनकी संज्ञाएँ उन्हें मौके पर दिखने वाले भावों से भर सकें।
आठ खूबसूरत सेविकाएँ अगवानी कर रही थी उनकी। वह धीमे-धीमे चल रहे थे। ख़ास काले सिंहासन को और बेहतर ढंग से सजाया गया था। श्वेत-धवल मसनद और गद्दे हर तरह से अनुकूल दिखते थे। पर जैसे दिखते थे, उससे शायद कहीं बेहतर रहे होंगे. कोई भी उन पर बैठकर सुकून का अनुभव तो आसानी से कर ही सकता था… यह समझा जाना कोई कठिन नहीं था। पर, यह क्या, इतने नर्म स्थान और नाजुक रेशमी लचीले गद्दों पर मसनदों का सहारा लेने के समय भी बीते हुए कल का शहजादा सलीम खुद को संभाल नहीं पा रहा था। बैठने से पहले सम्राट दो बार लडखडाते दिखे। शाही अंगरक्षकों ने उहें सहारा देकर संभाला। जाहिर है कि उनकी स्थिति सामान्य तो नहीं ही थी।
“हुजूर की इजाजत हो तो आज की कार्यवाही शुरू की जाए!”, प्रधानमंत्री ने उनके व्यवस्थित रूप से बैठने के बाद स्वागत करते हुए कहा।
सम्राट ने हाथ के इशारे से इजाजत दी।
“सम्राट नुरुद्दीन उर्फ़ शेखू साहब के दरबार में यह प्रस्ताव रखा जाता है कि चूँकि आज शराब की आदत हमारे राज्य में एक खतरनाक नशा बन चुकी है, जिससे घर बर्बाद हो रहे हैं, और लोगों को हरामखोरी और नशे की आदत पड़ती जा रही है, इसलिए आज से, अभी से, पूरे देश की सीमाओं के दायरे में किसी भी तरह की शराब के बनाने, बिक्री और सेवन पर पूरी तरह से रोक लगाई जाती है....” किसी को कोई मशवरा देना हो तो बेशक दे सकता है, कहा उन्होंने।
सभा में सन्नाटा पसर गया था. कुछ दरबारी सम्राट की आँखों के भावों को समझने का प्रयास कर रहे थे, और जो नजरों से थोड़ा दूर थे, वह अपने नजदीकी सिपहसालारों से फुसफुसाहट कर इस प्रस्ताव के निहितार्थ समझने की कोशिश कर रहे थे। यूँ ऊपरी तौर पर सबकी मौन सहमति दिख रही थी। प्रधानमंत्री ने आँखों-आँखों में पूरी सभा का जायजा लिया, उन्होंने एक बार फिर दोहराया,
“यह सभा जानना चाहती है कि क्या इस प्रस्ताव के सम्बन्ध में आप में से कोई अपनी राय या सुझाव या विरोध दर्ज करना चाहेगा? अगर हाँ तो बेशक अपना हाथ उठाए, यहाँ सबकी बात सुनी जायेगी”
यूँ प्रस्ताव अच्छा था पर सुझाव या विरोध का कोई स्वर नहीं उभरा। जैसे गूंगों- बहरों की सभा हो तभी सम्राट की आवाज गूंजी,
“शराब से खराब कोई लत नहीं। न जाने इसने क्या-क्या गुल खिलाये हैं। हम खुद इसके शिकार रहे हैं। सोलह साल की उम्र से पीना शुरू किया, और यह जालिम आज तक हमें छोडती ही नहीं, या कहो तो हम ही नहीं छोड़ना चाहते इसे। बस बड़ी बात यह है कि हर रोज़ बीस प्याले की खुराख से घटाकर हम छह प्याले पर तो आ गये हैं... पर...”,
कहकर शहंशाह ने एक विराम लिया। प्रधानमंत्री ने अपलक देखा पर उनकी सुर्ख आँखों में कोई विशेष भाव न दिखा. उन्होंने गुनगुनाया,
“बेमुरव्वत गर तुम हुए तो क्या...वो तुम थे,
हम भला भूल जाएँ तुमको...यह कैसे हो!”
“हुकुम में एक जगह दुरुस्त करना जरूरी है!”, शाही हुक्म जारी हुआ।
“जी हुजूर, हुक्म!”,
प्रधानमंत्री ने झुक कर समझना चाहा। दरबारी भी निगाह लगाए थे।
“जरूरत भर का निर्माण होते रहना चाहिए इस दवा का, जिसे न जाने क्या-क्या कहते हैं इसके चाहने वाले... सोचो, अगर यह न हो तो कुछ लोग जियेंगे कैसे! हम भी तो उन्हीं में से हैं. बाखुदा उसकी याद भर से ही सुरूर होने लगता है हमें तो। हमारे लिए तो यह दोहरी तलवार है”,
..और अपने ख़ास सेवक को इशारा किया उन्होंने। उसने सजी हुई चांदी की थाली में नक्काशीदार काम की धातु की सुराही और उसी तरह के चमकते गिलास में सम्राट का जाम बना कर उनके दरबार में हाज़िर कर दिया.।
“सुनो...और जो बिना इजाजत के शराब या शराब-आसा पीते दिखे दिखे, उसे हुकुमउदूली में कम से कम पचास कोड़े मारकर हवालात में डालने और मुनासिब जुर्माने का भी मुकम्मिल इंतजाम रखा जाए”,
आदेश देते हुए उन्होंने शराब के खूबसूरत गिलास से एक और घूँट भरी। यूँ भी यह दूसरा ही गिलास था उनका।
सभा बर्खास्त हुई। दरबारी कमर के पीछे दोनों हाथ बाँधने की मुद्रा में आ गये थे। ठीक वैसे ही जैसे उनके आगमन के समय हुए थे।
...कल के मुगल वंश के चराग शहजादा सलीम, और आज के सम्राट नुरुद्दीन सलीम जहाँगीर की शाही हरम की ओर रवानगी की इत्तिला की जा रही थी।
प्रस्तुतिः राजगोपाल सिंह वर्मा, आगरा