
Ahmedabad news . जन्म के बाद से जिसने कभी मुंह से दूध या भोजन का स्वाद नहीं चखा, वह ढाई साल का मासूम आखिरकार पहली बार अपने मुंह से खाना खा सका। बेटे को अपने हाथों से निवाला खिलाते देख माता-पिता की आंखें नम हो गईं। यह संभव हुआ अहमदाबाद सिविल अस्पताल के बाल शल्य चिकित्सा विभाग की उस जटिल सर्जरी से, जिसने जन्म से अन्ननली (इसोफेगस) नहीं होने की गंभीर जन्मजात समस्या से जूझ रहे बच्चे को नया जीवन दे दिया।
अहमदाबाद जिले के साणंद निवासी शैलेष पटेल के पुत्र मंतव्य अब ढाई वर्ष का है। यह बालक प्योर इसोफेजियल एट्रेसिया नामक दुर्लभ जन्मजात विकार के साथ जन्मा था। इस स्थिति में अन्ननली के दोनों सिरे आपस में नहीं जुड़े होते, जिससे बच्चा मुंह से दूध या भोजन निगल ही नहीं सकता। जन्म के दूसरे दिन ही उसकी जान बचाने के लिए गले और पेट में अलग-अलग रास्ते बनाकर ट्यूब के जरिए भोजन देने की व्यवस्था की गई थी। पिछले ढाई वर्षों से उसका पूरा पोषण इसी माध्यम से हो रहा था।
3 जुलाई को अहमदाबाद सिविल अस्पताल में अत्यंत जटिल 'गैस्ट्रिक पुल-अप' सर्जरी की गई। इसमें पेट के हिस्से से नई अन्ननली बनाकर उसे जोड़ा गया। अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक एवं पीडियाट्रिक सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. राकेश जोशी, प्रोफेसर डॉ. जयश्री रामजी तथा एनेस्थीसिया विभाग की विशेषज्ञ टीम ने यह ऑपरेशन सफलतापूर्वक किया।
इस ऑपरेशन के 23वें दिन बच्चे ने पहली बार मुंह से भोजन किया। अब वह पूरी तरह स्वस्थ है और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है। डॉ. राकेश जोशी ने बताया कि इस तरह की सर्जरी अत्यधिक तकनीकी कौशल मांगती है। निजी अस्पतालों में इस तरह के उपचार का खर्च लाखों रुपए तक हो सकता था लेकिन सिविल अस्पताल में निशुल्क किया गया। उनके अनुसार पिछले एक वर्ष में अस्पताल ने ऐसे सात जटिल मामलों का सफल उपचार किया है।
'ट्रेकियो-इसोफेजियल फिस्टुला (टीओएफ)' अथवा अन्ननली की जन्मजात विकृति लगभग 2,500 से 4,000 नवजात शिशुओं में एक को हो सकती है या फिर इस तरह की समस्या से बालक प्रभावित हो सकता है। इनमें 'प्योर इसोफेजियल एट्रेसिया' सबसे जटिल स्थिति मानी जाती है, जिसमें अन्ननली के दोनों सिरे काफी दूर होने के कारण सामान्य सर्जरी संभव नहीं होती।इस तरह से होती गैस्ट्रिक पुल-अप सर्जरीजब अन्ननली के दोनों सिरों को जोड़ना संभव नहीं होता, तब पेट (स्टमक) के हिस्से को ऊपर लाकर नई अन्ननली बनाई जाती है। इसे 'गैस्ट्रिक पुल-अप सर्जरी' कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार इस ऑपरेशन की सफलता दर 85 से 90 प्रतिशत तक होती है।