मौसम में अचानक आए बदलाव के चलते रबी फसलों में पाले से नुकसान की आशंका बढ़ गई है। कृषि विभाग ने किसानों को सरसों, चना, मटर और सब्जियों की फसलों को पाले से बचाने के लिए आवश्यक सावधानियां अपनाने की सलाह दी है।
अजमेर। मौसम में हो रहे बदलाव को देखते हुए फसलों में पाले से नुकसान की आशंका है। पाले से सरसों, मटर, चना और सब्जियों की फसलों को नुकसान हो सकता है। कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक संजय तनेजा ने पाला पड़ने के कारणों और बचाव के उपाय किसानों को अपनाने की सिफारिश की है।
रबी मौसम में पाले का सबसे अधिक असर पपीता, आम, आंवला, टमाटर, मिर्च, बैंगन, मटर, धनिया सहित अन्य सब्जियों की फसलों पर पड़ सकता है। पाले के कारण पौधों की कोशिकाओं में उपस्थित जल जम जाता है, जिससे कोशिका भित्ति फट जाती है।
इससे कोशिकाओं की दीवारें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और कोशिका छिद्र (स्टोमेटा) नष्ट हो जाते हैं। पाला पड़ने से कार्बन डाइऑक्साइड और ऑक्सीजन के वाष्प विनिमय की प्रक्रिया भी बाधित होती है। इसके कारण पौधों की पत्तियां झुलसने लगती हैं तथा फूल और फल झड़ने लगते हैं, जिससे पैदावार में कमी आती है।
किसान फसलों को पाले से बचाने के लिए गंधक के तेजाब का 0.1 प्रतिशत घोल तैयार करें। इसके लिए एक हजार लीटर पानी में एक लीटर सांद्र गंधक का तेजाब मिलाकर फसलों पर छिड़काव करें। पाला पड़ने की संभावना वाले दिनों में मिट्टी की गुड़ाई या जुताई नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे मिट्टी का तापमान कम हो जाता है। फसलों में सिंचाई करें, इससे पाले का असर कम होता है। ठंडी हवा मिट्टी की सतह को पार नहीं कर पाती, जिससे फसलों को नुकसान नहीं होता। वहीं पैदावार बढ़ती है।
सर्दी के मौसम में जिस दिन दोपहर से पहले ठंडी हवा चल रही हो और तापमान अत्यंत कम हो जाए तथा दोपहर बाद अचानक हवा चलना बंद हो जाए, उस दिन पाला पड़ने की संभावना बढ़ जाती है। जब वायुमंडल का तापमान 4 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है और हवा का प्रवाह बंद हो जाता है, तो पौधों की कोशिकाओं के अंदर और ऊपर मौजूद पानी जम जाता है। इसी स्थिति को पाला कहा जाता है।