अजमेर पुलिस लाइन में 15वीं से 20वीं सदी तक इस्तेमाल हुए ऐतिहासिक हथियारों की खास प्रदर्शनी लगाई गई। आईजी अंशुमान भौमिया ने उद्घाटन कर हथियारों का निरीक्षण किया और संरक्षण में जुटी आरमोर शाखा की मेहनत की सराहना करते हुए रिवॉर्ड रोल देने की घोषणा की।
अजमेर। पुलिस लाइन के सालाना निरीक्षण में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक हिमांशु जांगिड़ और आरमोर शाखा की ओर से 15वीं से 20वीं सदी तक प्रचलित ऐतिहासिक हथियारों की लगाई गई अनूठी प्रदर्शनी का पुलिस महानिरीक्षक अंशुमान भौमिया ने उद्घाटन किया। उन्होंने प्राचीन हथियारों को हाथ में लेकर उनकी कार्यप्रणाली देखने के साथ ही हथियारों के संरक्षण में की गई मेहनत की तारीफ की। इस मौके पर उन्होंने आरमोर शाखा को ‘रिवॉर्ड रोल’ देने की भी घोषणा की।
अजमेर एसपी हर्षवर्धन अग्रवाला ने आईजी भौमिया को बताया कि मुख्यालय की अनुमति के बाद 9 माह से एएसपी (सिटी) हिमांशु जांगिड़ व आरमोर शाखा ने जिला मालखाने के 1700 हथियारों का निस्तारण करने के साथ ही इनमें से 20 ऐतिहासिक हथियारों को संरक्षित किया। इसमें आर्मोरर तेजसिंह, हेडकांस्टेबल धर्मीचन्द, सिपाही उमराव, धारासिंह, श्रीनिवास और राजू की विशेष भूमिका रही। उन्होंने बताया कि इन हथियारों को जिला पुलिस कार्यालय में प्रदर्शित किया जाएगा।
आइजी भौमिया ने एएसपी जांगिड़ के इस प्रयास की सराहना करते हुए एसपी हर्षवर्धन अग्रवाला को प्रशंसा पत्र व आरमोर शाखा को रिवॉर्ड रोल देने की घोषणा की। पत्रिका ने गत 21 मई के अंक में ‘रियासतकालीन पिस्टल बढ़ाएगी पुलिस गैलरी की शान’ शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी।
'लमछड़' (या लंबछड़) एक देशी, सिंगल-बैरल और लंबी नली वाली बंदूक का नाम है। 15वीं शताब्दी में दुनिया में मैचलॉक मतलब माचिस से चलने वाले तकनीक के हथियार विकसित हुए थे। इसमें जलती हुई डोरी या माचिस से बारूद में आग लगाई जाती थी और फायर होता था। इसी तकनीक पर आधारित लंबी बैरल वाले हथियारों का इस्तेमाल भारत और अन्य जगहों पर होने लगा था। 'लमछड़' शब्द का अर्थ ही लंबी छड़ या नली वाला हथियार होता है। यह एक टोराडार अर्थात भारतीय मैचलॉक का ही एक देसी रूप कहा जाता है। इसे टोपीदार बंदूक के रूप में भी जाना जाता है।