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रक्तिम तिवारी/अजमेर.
कुलपति के कामकाज पर लगी रोक से महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय को ऋषि दयानंद चेयर का काम अटक गया है। बीते तीन महीने में चेयर में कई का प्रारंभ हो सकते थे, पर सारी योजनाओं पर फिलहाल पानी फिरा हुआ है। कुलपति की गैर मौजूदगी से चेयर की विधिवत स्थापना ही नहीं हो पाई है।
केंद्रीय मानव संसाधन विकास, जल संसाधन और गंगा पुनुरुद्धार मंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह ने बीते वर्ष ऋषि मेले के दौरान वैदिक पार्क सहित महर्षि दयानंद सरस्वती चेयर स्थापित करने की घोषणा की थी। जनवरी 2018 में पर्यावरण विभागाध्यक्ष और दयानंद शोध पीठ निदेशक प्रो. प्रवीण माथुर ने यूजीसी को महर्षि दयानंद सरस्वती चेयर के प्रस्ताव से अवगत कराया। लेकिन यूजीसी ने कार्यवाहक कुलपति और कुलसचिव होने का तर्क देकर इसकी स्वीकृति नहीं दी। चौतरफा दबाव के बाद पिछले साल अक्टूबर में संयुक्त सचिव प्रो. जितेंद्र कुमार त्रिपाठी ने चेयर स्थापित करने का प्रस्ताव मंजूर किया।
यह होना है चेयर में
चेयर की स्थापना पांच साल के लिए होगी। इसे अधिकतम 2 साल के और बढ़ाया जा सकेगा। विश्वविद्यालय को छह माह के भीतर चेयर के लिए प्रोफेसर की नियुक्ति करनी होगी। इसके लिए प्रोफेसर पद मिलेगा। 55 से 70 साल तक के ख्यातनाम विद्वान (वैदिक अध्ययन के ज्ञाता) को पांच साल के लिए नियुक्ति दी जाएगी। यूजीसी चाहे तो दो साल कार्यकाल बढ़ा सकेगी। विश्वविद्यालय को प्रोफेसर का चयन बाकायदा विज्ञापन के जरिए रिक्ति आमंत्रित, कुलपति द्वारा तीन सदस्यीय चयन समिति गठन के बाद किया जाएगा।
नहीं हो पाई है विधिवत शुरुआत
तीन महीने बीतने के बावजूद ऋषि दयानंद चेयर की विधिवत शुरुआत नहीं हो पाई है। कुलपति प्रो. आर. पी. सिंह के कामकाज पर लगी रोक के चलते ऐसा हुआ है। पर्यावरण विज्ञान विभाग के चरक भवन में चेयर का दफ्तर जरूर बना है, लेकिन चेयर में प्रोफेसर की नियुक्ति, शोध और अन्य कार्य अटके हुए हैं। कुलपति ही इन कार्यों के लिए अधिकृत हैं।
यूजीसी यूं करेगा वित्तीय सहायता
-किताबों-जर्नल्स के लिए 1.50 लाख रुपए (पांच साल के लिए) 30 हजार रुपए (अतिरिक्त दो वर्ष के लिए)
-यात्रा भत्ता (स्थानीय-राष्ट्रीय)-1 लाख रुपए प्रतिवर्ष
-सचिवालय सहायता-1.50 लाख रुपए प्रतिवर्ष
-कार्यशाला, सेमिनार, ग्रीष्मकालीन पाठ्यक्रम और अन्य कार्य-1 लाख रुपए प्रतिवर्ष
-फील्ड वर्क, डाटा संग्रहण और अन्य कार्य-1.20 लाख रुपए प्रतिवर्ष