अजमेर

घुट रहा बचपन, अब ‘की-पैड मैदान का सहारा

शहर में खेल मैदानों का अभाव, पार्कों में समितियों का कब्जाबच्चों को खेलने के लिए पार्क भी नसीब नहीं

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Oct 09, 2019
घुट रहा बचपन, अब 'की-पैड मैदान Ó का सहारा,घुट रहा बचपन, अब 'की-पैड मैदान Ó का सहारा

अजमेर. शहरी क्षेत्र की कॉलोनियों में बचपन घुट रहा है, खेलने के मैदान है ना खाली भूखण्ड। जिन कॉलोनियों में पार्क हैं वहां संचालन के नाम से समितियों ने कब्जा कर रखा है। इन पार्कों में बच्चों को खेलने भी नहीं दिया जाता है। पार्कों में कहीं घूमने के ट्रेक तो कहीं जिम के प्लेटफार्म बना दिए गए हैं। ऐसे में बच्चों को खेलनेे की आजादी भी नहीं मिल रही है। उधर, आसपास में खेल मैदान उपलब्ध नहीं है। यही वजह है कि बच्चे मोबाइल गेम अधिक खेलते हैं।

अजमेर शहर की विभिन्न कॉलोनियों में बच्चों को खेलने की कहीं आजादी नहीं है। गली मोहल्लों में आस पडौस की टोकाटाकी तो पार्कों में संचालन समितियों की दखलंदाजी इन पर भारी है। खेल मैदानों के अभाव में बच्चे घरों में या तो टीवी पर गेम खेलते हैं या मोबाइल पर अंगुलियां चलाते हैं। कॉलोनियों के पार्कों में कहीं मंदिर तो कहीं सामुदायिक भवन बने होने से मैदानों का दम घुट गया है। पत्रिका की पड़ताल में लगे मिले तालेशहर की विभिन्न कॉलोनियों में सोमवार को दोपहर 12.30 बजे सार्वजनिक पार्कों का जायजा लिया गया जहां प्रमुख पार्कों के गेट पर ताला लगा मिला। यह ताले समितियों के पदाधिकारियों की ओर से लगाए गए हैं।

शहर के प्रमुख खेल मैदान

-पटेल स्टेडियम (नगर निगम)
-चन्द्रवरदाई स्टेडियम (एडीए)
-जीएलओ ग्राउंड (रेलवे)
-केरिज ग्राउंड (रेलवे)
-कायड़ मैदान (दरगाह कमेटी)
(इनमें अधिकांश मैदानों पर क्रिक्रेट, फुटबॉल आदि खेलों का शुल्क 2500 से 3500 हजार रुपए लिया जाता है। )

शिक्षण संस्थाओं के यह खेल मैदान

-सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय
-मेयो कॉलेज-मयूर स्कूल-सेन्ट पॉल स्कूल
-संस्कृति स्कूल
-पुलिस लाइन राउमावि मैदान

इन सुझावों पर अमल से बच सकेगा बचपन
-पार्कों में बच्चों को दिनभर खेलने का मिले सुविधा।
-कॉलोनियों के पार्कों के गेट पर नहीं लगे ताला।
-बच्चों को अपनी इच्छानुसार खेल खेलने दें।
-पार्कों में सामुदायिक भवन व अन्य भवन के लिए पृथक जमीन मिले।
-बच्चों को मोबाइल गेम खेलने से रोकें।
-बच्चों के शारीरिक विकास के लिए आउटडोर खेल खिलाना जरूरी।

एक्सपर्ट व्यू:
यह गंभीर विषय है। बचपन में शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक विकास खेलों से होता है, मगर बच्चे आजकल मोबाइल पर व्यस्त रहते हैें। हर घर में अभिभावक मोबाइल पर व्यस्त तो बच्चे भी मोबाइल पर व्यस्त रहने लगे हैं। बच्चों को आउटडोर खेलों के प्रति प्रेरित करना चाहिए। खेलों से अपनेपन की भावना विकसित होती है।

डॉ.अशोक चौधरी, वरिष्ठ मनोचिकित्सक (पूर्व प्रिंसीपल जेएलएन मेडिकल कॉलेज)

Published on:
09 Oct 2019 12:15 am
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