
दिलीप शर्मा/अजमेर।
तब राजनीति का रूप कुछ औरथा। दल दल नहीं थी। नेताओं में सादगी ऐसी कि अपने परिजन के लिए राजनीतिक प्रभाव का उपयोग नहीं करते। पहनावा खादी से बढ़ कर नहीं था। तब के नेता कार्यकर्ताओं में निष्ठा और जुबान की बात थी। बात ही बात में जुबान दे दी और चुनाव लडऩे का दावा ही छोड़ दिया। हम बात कर रहे हैं। प्रखर गांधीवादी नेता और मेवाड़ के गांधी कहे जाने वाले चांदमल सकलेचा की।
देवगढ़ मदारिया जिला राजसमंद के ग्राम छापली के मूल निवासी सुकलेचा ने जीवन पर्यंत कोई चुनाव नहीं लड़ा पार्टी की तरफ से जो भी जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई प्रशासन की या संगठन की उसको बखूबी निभाया एक बार तो पार्टी ने टिकट की पेशकश की तब देवगढ़ ठाकुर परिवार परिवार की बेटी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत ने 1962 में उनसे आग्रह किया कि वह भी चुनाव लडऩा चाहती हैं तब सकलेचा ने खुद को चुनावी को दौड़ से हटा लिया। लक्ष्मी कुमारी चूंडावत 1962 से 1971 तक विधायक रहीं। लक्ष्मी कुमारी की भतीजी सीता देवी थी जो पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की पत्नी थी। और देवगढ़ राव साहब नाहर सिंह की बहन थी।
अजमेर से भी नाता रहा
लक्ष्मी कुमारी की अनौपचारिक शिक्षा घर मेंहुई जबकि देवगढ़ राज परिवार के राव विजय सिंह, नाहर सिंह, भतीजे मानदाता सिंह सहित अन्य अब तक उनके वंशज के बच्चे मेयो कॉलेज अजमेर में अध्ययनरत रहे।
सादगी की मिसाल
सादगी और खादी सकलेचा खादी ग्रामोद्योग मंडल के चेयरमैन रह चुके थे। वह केवल दो ही पोशाक का उपयोग करते थे और कुछ जिसमें धोती,कुर्ता, टोपी रुमाल, मफलर यहां तक कि थैला भी खादी का होता था। उन्होंने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए कभी किसी अपने राजनीतिक प्रभाव का उपयोग नहीं किया।
बिट्स पिलानी से इंजीनियरिंग कर चुके अपने छोटे पुत्र ललित कुमार जो वर्तमान में पीएम कौशल विकास विभाग में कार्यरत हैं, के लिए भी उन्होंने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल नहीं किया। नौकरी में स्थानांतरण तक को वह सामान्य मानते थे। उनका मानना था कि सरकार जहां भेजे वहां जाने के लिए तैयार रहो, मुझसे किसी प्रकार की सिफारिश की उम्मीद मत रखो।
गांधीवादी रहे जीवन पर्यंत
पिछले 50 वर्षों तक वे नियमित अपने जीवन काल में प्रतिदिन डायरी लिखा करते थे जो गांधी डायरी लिखते थे। बड़ी डायरी गांधी डायरी कहलाती थी ,जबकि छोटी डायरी गीता दैनंदिनी कहलाती थी अंतिम 18 सालों मेंअंतिम 18 सालों में गांधी डायरी नियमित रूप से लिखी और 95 वर्ष की अवस्था में उनका देहांत हुआ। सकलेचा के समकालीन नेताओं में गौकुल भाई भट्ट, सिद्धराज डढ्ढा, आचार्य विनोबा भावे,मोहनलाल सुखाडिय़ा थे। पत्रिका मित्र अजमेर निवासी बी. एल. सामरा जो सकलेचा के करीबी रिश्तेदार हैं ने पत्रिका को उक्त संस्मरण की जानकारी दी।