अलवर में आर्यिका माताजी दुर्घटना मामले की निष्पक्ष जांच और देश में 'राष्ट्रीय संत सुरक्षा नीति' लागू करने की मांग को लेकर सोमवार को सकल जैन समाज ने मौन जुलूस निकाला। समाज के लोगों ने जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर राष्ट्रपति के नाम प्रशासन को एक ज्ञापन भी सौंपा।
रीवा (मध्य प्रदेश) में विहार के दौरान आर्यिका माताजी के संघ के साथ हुई दर्दनाक सड़क दुर्घटना के विरोध में आज अलवर का जैन समाज सड़कों पर उतरा। इस हादसे में पूज्य आर्यिकाओं का असामयिक निधन हो गया था, जिससे पूरे देश के जैन समाज में गहरा शोक और आक्रोश है। इसी सिलसिले में सोमवार सुबह 9:30 बजे श्री आदिनाथ जैन शिक्षण संस्थान, स्कीम नंबर-8 से एक विशाल मौन जुलूस शुरू हुआ। यह जुलूस शहर के मुख्य मार्गों से होता हुआ जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचा, जहां विभिन्न जैन संगठनों के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति के नाम अपनी मांगों का पत्र अधिकारियों को सौंपा।
प्रदर्शन में शामिल जैन समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि रीवा की घटना को केवल एक साधारण सड़क दुर्घटना नहीं माना जा सकता। उपलब्ध तथ्यों और सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो क्लिपों के आधार पर समाज में गहरी आशंका और चिंता पैदा हो गई है। इसलिए इस पूरे प्रकरण की किसी उच्च स्तरीय एजेंसी या एसआईटी (SIT) से निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जानी चाहिए। साथ ही हादसे से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज और डिजिटल सबूतों को सुरक्षित कर दोषियों पर कठोरतम कानूनी कार्रवाई की जाए।
ज्ञापन के माध्यम से राष्ट्रपति से मांग की गई है कि देश में पैदल विहार करने वाले जैन साधु-संतों की सुरक्षा के लिए एक ठोस 'राष्ट्रीय संत सुरक्षा नीति' और एसओपी (SOP) बनाई जाए। जैन संत पूरी तरह निहत्थे, अहिंसक होते हैं और वे आजीवन केवल पैदल ही विहार करते हैं। वे किसी भी प्रकार की निजी सुरक्षा या वाहनों का उपयोग नहीं करते हैं और समाज में शांति व संयम का संदेश फैलाते हैं। ऐसे में उनके खिलाफ बढ़ती दुर्घटनाएं और हमले बेहद चिंताजनक हैं, इसलिए संतों के विरुद्ध होने वाले अपराधों को विशेष संवेदनशील श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
स्थानीय स्तर पर प्रशासन से मांग की गई है कि जब भी संत विहार करें, तो उनके मार्गों पर प्रशासनिक समन्वय, संवेदनशील क्षेत्रों में पुलिस सुरक्षा, ट्रैफिक नियंत्रण और हाईवे पर विशेष चेतावनी संकेतक लगाए जाएं। इसके अलावा प्रशासन और समाज के बीच बेहतर तालमेल के लिए 'संत सुरक्षा कोऑर्डिनेशन सेल' और आपातकालीन संपर्क व्यवस्था भी शुरू की जानी चाहिए। इस आंदोलन में अलवर के कई प्रमुख जैन संगठन और सैकड़ों की संख्या में समाज के प्रबुद्ध लोग शामिल हुए।