अलवर

अलवर से एक कविता रोज: ‘ लाचारी ‘ लेखिका- सुमन गुप्ता अलवर

मन उधड़ सा गया,मन विचलित सा हों गया,जाने कौनसा दिन आ गया।।। बीते लम्हों को याद किया,वो दर्द भरा पल याद आ गया।कैसे भूल पाऊंगी उस दिन को,वो बिता हुआ समय याद आ गया।।

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Sep 24, 2020
Alwar Se Ek Kavita Roj Lachari By Suman Gupta Alwar
अलवर से एक कविता रोज: ' लाचारी ' लेखिका- सुमन गुप्ता अलवर

मन उधड़ सा गया,
मन विचलित सा हों गया,
जाने कौनसा दिन आ गया।।।
बीते लम्हों को याद किया,
वो दर्द भरा पल याद आ गया।
कैसे भूल पाऊंगी उस दिन को,
वो बिता हुआ समय याद आ गया।।
सुकून भरी कोई सांसे ना थी,
एकाएक रिश्तों को काँच सा बिखरता देख,
मन कुछ घबरा सा गया।।
ये कैसा मंजर है ??
दिल कुछ दहला सा गया।।
प्रति पल जिस रिश्ते को विश्वास मे संजोया,
उसका आज एक मनका टूटा सा नजर आ गया।।
अति थर्रायी आँखों से देखा उसे,
देख रूह को कम्पन होने लगी,
आज फिर एक गरीब भूख के कारण मारा गया।।।।।
ये कैसी लाचारी है ,कैसा अपनापन??
जब जरूरत आयी, तो बना लिए रिश्ते।
जब जेब हुई खाली भुल गए सब रिश्ते।।
उस गरीब की पुकार सुनो।।।
विश्वास कैसे मे कर पाऊंगा??
इन बच्चों को दो वक्त की रोटी कहाँ से लाऊँगा??
इसमें इन मासूमों का क्या दोष है??
मैं तो अब इन्हें छोड़ संसार से चला गया।।
कोई संभालो ।। इन बच्चों को।
क्योंकि आज फिर एक गरीब भूख से मारा गया।।।।

सुमन गुप्ता
अलवर

Published on:
24 Sept 2020 07:35 pm