अलवर

Alwar: गूगल मैप के जमाने में भी अलवर के ये बरगद-पीपल हैं सबसे बड़े लैंडमार्क

आज के डिजिटल दौर में जहां लोग रास्ता ढूंढने के लिए गूगल मैप और लोकेशन पिन का इस्तेमाल करते हैं, वहीं अलवर शहर में आज भी दशकों पुराने बरगद और पीपल के पेड़ सबसे भरोसेमंद लैंडमार्क बने हुए हैं। वन महोत्सव के मौके पर नए पौधे लगाने के साथ-साथ इन विरासत वृक्षों को बचाने की मुहिम तेज हो गई है।
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Jul 03, 2026
alwar van mahotsav
सागर ​स्थित इस बड़ के पेड़ के नीचे हुई हैं कई शादियां (फोटो - पत्रिका)

मौजूदा वक्त में बदलते शहर, चौड़ी होती सड़कों और बढ़ती आबादी के बीच अलवर की कई जगहें आज भी अपनी पुरानी पहचान समेटे हुए हैं। वन महोत्सव के तहत जिला प्रशासन और वन विभाग नए पौधे लगाने में जुटा है, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि नए पौधों को रोपने के साथ-साथ उन दशकों पुराने पेड़ों की कद्र और संरक्षण भी बेहद जरूरी है, जो वर्षों से हमारी संस्कृति और रास्तों की पहचान बने हुए हैं।

मन्नी का बड़: पेड़ के नाम से मशहूर हुआ पूरा इलाका

शहर का 'मन्नी का बड़' क्षेत्र इसका सबसे जीवंत उदाहरण है। यहां मौजूद बरगद (बड़) का एक विशालकाय पेड़ न सिर्फ लोगों को छांव देता है, बल्कि वर्षों से इस पूरे कमर्शियल और रिहायशी इलाके का नाम ही इसी पेड़ के नाम पर पड़ गया। आज भी अगर किसी को इस रूट का पता समझाना हो, तो लोग गूगल मैप से पहले 'मन्नी का बड़' का नाम सबसे भरोसे से लेते हैं।

वो पेड़, जिसके नीचे हुईं कई शादियां

इसी तरह ऐतिहासिक सागर जलाशय के समीप स्थित बरगद का एक और विशाल पेड़ है, जिसका अलवर के लोगों से गहरा भावनात्मक जुड़ाव है। यह पेड़ सिर्फ पर्यावरण के लिहाज से ही नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने का भी गवाह रहा है। इस पेड़ की घनी और ठंडी छांव तले बीते कई सालों में दर्जनों शादियां और बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजन संपन्न हो चुके हैं।

इस पेड़ से पड़ा एरिया का नाम मन्नी का बड़ (फोटो - पत्रिका)


पीपल वाले मंदिर से लेकर समाधि तक बिखरी है पहचान

इसके अलावा पुराना कटला और होप सर्कस जैसे व्यस्ततम इलाकों के कुछ छोटे हिस्से आज भी वहां मौजूद पीपल के प्राचीन पेड़ों की वजह से जाने जाते हैं। वहीं रामगढ़ क्षेत्र में स्थित 'पीपल वाला हनुमान मंदिर' की तो पूरी पहचान ही इस पेड़ से जुड़ चुकी है। इतना ही नहीं, नवगठित खैरथल-तिजारा जिले में 'पीपल वाली समाधि' भी आस्था का बड़ा केंद्र है, जिसकी पहचान इस पावन वृक्ष से ही है।


पुराने पेड़ हमारी विरासत

विशेषज्ञों का कहना है कि इन विरासत वृक्षों ने अलवर शहर के इतिहास और इसके बदलते स्वरूप को बहुत करीब से देखा है। वन महोत्सव के इस पावन मौके पर हमें इन जीवित स्मारकों को सहेजने का संकल्प लेना होगा, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी भी कंक्रीट के जंगलों के बीच प्रकृति के इस अनमोल लैंडमार्क को देख सके।

सरिस्का से रिटायर्ड पूर्व क्षेत्र निदेशक आरएस शेखावत कहते हैं कि पुराने बरगद और पीपल जैसे वृक्ष केवल हरियाली के लिए नहीं हैं, बल्कि शहर-कस्बों की प्राकृतिक और सामाजिक विरासत हैं। इनका संरक्षण जैव विविधता, पर्यावरण संतुलन और स्थानीय इतिहास को बचाने के लिए आवश्यक है। वन महोत्सव के दौरान पौधरोपण के साथ इन पुराने वृक्षों की नियमित देखभाल, सुरक्षा और वैज्ञानिक संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए, तभी हरियाली की यह विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकेगी।

Published on:
03 Jul 2026 12:12 pm