अलवर

क्लाइमेट चेंज की मार… बदला बारिश का मिजाज, टूट गया फसल चक्र

मौसम के बदले मिजाज से अलवर जूझ रहा है। गर्मी में सावन जैसी बारिश ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। बारिश का पैटर्न बदलने से कई पारंपरिक फसलें धीरे-धीरे खेतों से गायब हो रही हैं। अनाज ही नहीं, फल-फूल और उद्यानिकी उत्पादन पर भी इसका असर साफ नजर आ रहा है। बेमौसम बारिश के कारण मिट्टी में नमी बनी रहती है और कीटाणु तेजी से पनप रहे हैं। इसका असर अगली फसल की गुणवत्ता और पैदावार दोनों पर पड़ रहा है।

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May 16, 2026
खेत का फाइल फोटो पत्रिका

कभी मई-जून की तपती गर्मी के लिए पहचाना जाने वाला अलवर अब मौसम के बदले मिजाज से जूझ रहा है। इस बार गर्मी के मौसम में सावन जैसी बारिश ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। क्लाइमेट चेंज का असर खेतों में दिखाई देने लगा है। बारिश का पैटर्न बदलने से फसल चक्र टूट रहा है और कई पारंपरिक फसलें धीरे-धीरे खेतों से गायब होती जा रही हैं। इसका असर सिर्फ अनाज तक सीमित नहीं, बल्कि फल-फूल और उद्यानिकी उत्पादन पर भी साफ नजर आने लगा है। खेती के लिए जमीन का समय पर तपना बेहद जरूरी होता है, ताकि पुराने कीटाणु और फफूंद नष्ट हो सकें, लेकिन लगातार हो रही बेमौसम बारिश के कारण मिट्टी में नमी बनी रहती है और कीटाणु तेजी से पनप रहे हैं। इसका असर अगली फसल की गुणवत्ता और पैदावार दोनों पर पड़ रहा है।
मंडियों से गायब हो रहीं पारंपरिक फसलें
एक समय अलवर की पहचान रही तोरिया, अरहर, मूंग-मोठ, ग्वार, तिल और उड़द जैसी फसलें अब मंडियों में मुश्किल से नजर आती हैं। मंडी व्यापारियों के अनुसार करीब 25 से 30 साल पहले इन फसलों की आवक हजारों क्विंटल में होती थी, लेकिन बदलते मौसम और असमय बारिश ने इनकी खेती को घाटे का सौदा बना दिया। पहले अलवर मंडी में मूंग-मोठ की करीब 10 हजार क्विंटल आवक होती थी, लेकिन अब यह लगभग खत्म हो चुकी है। इसी तरह चने की आवक, जो कभी 20 हजार क्विंटल तक पहुंचती थी, अब पूरे सीजन में महज 4 से 5 हजार क्विंटल रह गई है। किसानों को नुकसान होने की वजह से इन फसलों की बुवाई कम कर दी है। बेमौसम बारिश का असर उद्यानिकी क्षेत्र पर भी पड़ रहा है। फूलों में समय से पहले झड़ाव, फलों में रोग और उत्पादन में गिरावट देखने को मिल रही है। मौसम में अचानक बदलाव से पौधों की प्राकृतिक वृद्धि प्रभावित हो रही है। इससे किसानों की लागत बढ़ रही है और मुनाफा घटता जा रहा है।
मिट्टी की सेहत बिगड़ रही
लगातार नमी और अनियमित बारिश से मिट्टी की उर्वरक क्षमता कमजोर हो रही है। मिट्टी का पीएच स्तर बदल रहा है, जिससे कई पारंपरिक फसलें अनुकूल वातावरण नहीं पा रहीं। कई इलाकों में जमीन में लवण संतुलन भी बिगड़ने लगा है, जो आने वाले वर्षों में खेती के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। मानसून से पहले अलवर में कुल 502 मिमी पानी बरसा है। इसमें अप्रेल में 181 और मई में 19 मिमी बारिश दर्ज हुई है। जिलेभर में जनवरी में एक बार, फरवरी में दो बार, मार्च में तीन बार, अप्रेल में चार और मई में तीन बारिश हुई है। हालांकि हल्की बारिश का सिलसिला जारी रहता है।

Published on:
16 May 2026 11:07 am
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