मध्यप्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस ने पांच बाघों की जान ले ली है। इस खौफनाक खबर के बाद राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व में हड़कंप मच गया है। प्रशासन ने आनन-फानन में अलर्ट जारी कर दिया है, क्योंकि गांवों के आवारा कुत्ते इस जानलेवा बीमारी के वाहक बन सकते हैं।
मध्यप्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व से आई दुखद खबर ने देशभर के वन्यजीव प्रेमियों और वन विभाग की नींद उड़ा दी है। महज कुछ ही दिनों के भीतर पांच बाघों की मौत के पीछे 'कैनाइन डिस्टेंपर' नामक खतरनाक वायरस का हाथ पाया गया है। इस घटना के बाद अब अलवर के सरिस्का टाइगर रिजर्व में भी खतरे की घंटी बज गई है। सरिस्का प्रशासन ने तुरंत अलर्ट मोड पर आते हुए अपनी टीमों को सक्रिय कर दिया है और बाघों की सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। विशेषज्ञों का साफ कहना है कि अगर समय रहते टीकाकरण और सख्त मॉनिटरिंग नहीं की गई, तो परिणाम बेहद गंभीर और भयावह हो सकते हैं।
यह वायरस कितना घातक है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे वन्यजीवों का 'कोरोना' कहा जा रहा है। यह सीधा बाघों के फेफड़ों पर हमला करता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को पूरी तरह खत्म कर देता है। धीरे-धीरे यह शरीर के अन्य अंगों को अपनी चपेट में ले लेता है, जिससे बाघ बेहद कमजोर हो जाता है और अंततः उसकी मौत हो जाती है। सरिस्का के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक आरएस शेखावत बताते हैं कि यह संक्रमण मुख्य रूप से संक्रमित कुत्तों के जरिए फैलता है। यदि कोई संक्रमित कुत्ता जंगल में मांस खाता है और उसी मांस को कोई दूसरा जंगली जानवर खा लेता है, तो वायरस का चक्र शुरू हो जाता है। इसके अलावा, बाघ और बघेरे अक्सर गांवों के आवारा कुत्तों का शिकार करते हैं, जो इस वायरस के सीधे संपर्क में आने का सबसे बड़ा जरिया है।
सरिस्का टाइगर रिजर्व करीब 1213 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और इसके चारों ओर लगभग 80 गांव बसे हुए हैं। अनुमान के मुताबिक, इन गांवों में करीब 16 हजार से अधिक आवारा कुत्ते मौजूद हैं। ये कुत्ते अक्सर भोजन की तलाश में जंगल की सीमा में दाखिल हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार, टाइगर रिजर्व के आसपास के सभी कुत्तों का टीकाकरण अनिवार्य है, लेकिन सरिस्का में अभी यह काम अधूरा है। फिलहाल सरिस्का में 52 बाघ हैं, जिन्हें पिछले 16 वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद सहेजा गया है। ऐसे में एक भी संक्रमित कुत्ता पूरी बाघ आबादी के लिए काल बन सकता है।
इतिहास गवाह है कि सरिस्का ने पहले भी ऐसी त्रासदियां झेली हैं। साल 1972 में रिंडरपेस्ट और एंथ्रेक्स जैसी बीमारियों के कारण यहां बड़ी संख्या में सांभर खत्म हो गए थे। अब कैनाइन डिस्टेंपर के लक्षण, जैसे सांस लेने में तकलीफ, आंखों और नाक से पानी गिरना, तेज बुखार और शरीर में झटके आना, वनकर्मियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। जानकारों का मानना है कि इस मामले को सिर्फ पशुपालन विभाग के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि इसके लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाकर दिन-रात मॉनिटरिंग की जरूरत है ताकि सरिस्का की शान इन बाघों को बचाया जा सके।
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस को लेकर हमारी पूरी टीम मुस्तैद है। आवारा कुत्तों के वैक्सीनेशन पर जोर दिया जा रहा है। लगातार इसकी मॉनिटरिंग कर रहे हैं। यहां अभी ऐसा कोई मामला नहीं आया है - संग्राम सिंह कटियार, क्षेत्र निदेशक, सरिस्का