3 परिवारों को सड़क हादसे ने दिया जिंदगीभर का जख्म...इन कहानियों से पत्रिका का मकसद आपको डराना नहीं, सावधान करना है।
Rajasthan Road Accident: वाहन धीमी गति से चलाएं, अपना कीमती जीवन बचाएं… इस लाइन को पढ़कर ही आप समझ गए होंगे कि हम क्या कहना चाह रहे हैं। दरअसल आज हम उन परिवारों की कहानी आपके सामने रख रहे हैं, जिन्होंने सड़क दुर्घटनाओं में अपनों को खोया है। किसी का बेटा तो किसी का पिता और भाई सड़क हादसे में जान गंवा बैठा और परिजनों को अकेला छोड़ गया। अपनों को खो चुके इन परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट है, तो वहीं भविष्य की अनगिनत चुनौतियां भी। आए-दिन ये लोग बिछड़ों को याद कर रोते हैं और हर किसी से यही कहते हैं कि वाहन सावधानी से चलाएं। खुद भी बचें और दूसरे को भी बचाएं।
भिवाड़ी के लाखन सिंह सुबह ड्यूटी के लिए बाइक से निकले थे। तेज गति और गलत दिशा में आ रही स्कूली बस ने टक्कर मार दी। जिससे वह गंभीर रूप से घायल हुए और अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। उनकी पत्नी और बेटा-बेटी आज भी उन्हें याद करके रोते हैं। लाखन की उम्र 35 साल थी। पाउआ भरतपुर से भिवाड़ी आकर लाखन एक फैक्ट्री में काम करते थे और परिवार को पाल रहे थे। बेटा ध्रुव तब आठ और बेटी वैशाली तीन साल की थी। बच्चे तुतलाते हुए पापा कहना सीखे थे, तभी उनके सिर से पिता का साया उठ गया। लाखन की मां भी जवान बेटे का गम नहीं झेल सकी और एक साल बाद दुनिया को छोड़ दिया। नादान बच्चों के सिर से पिता के बाद दादी की छाया भी हट गई। बच्चे अभी भी मां से पूछते हैं कि हमारे पापा कहां है। वह कब घर आएंगे। मां की पथरीली आंखें भर आती है, उन्हें समझाती है। उनकी हर इच्छा को पूरी करने वाला संरक्षक नहीं रहा।
छठी मील के पास ककराली गांव की तरफ जाने वाले कट पर एक नवंबर को तेज रफ्तार थार गाड़ी ने बाइक को टक्कर मार दी। इस दुर्घटना में नगली झीड़ा गांव के महेन्द्र जाटव, उसकी पत्नी गुड्डी, पुत्र पूर्वांश और भतीजी पायल की मौत हो गई, जबकि चार वर्षीय खुशबू के शरीर का आधा हिस्सा पैरालाइज हो चुका है।
महेन्द्र के 5 बच्चे हैं, जिनमें से पुत्र पूर्वांश की मौत हो गई। अब उसकी तीन बेटियों के समक्ष जीवनयापन का संकट खड़ा हो गया है। बड़ी बेटी मोनिका 17, उससे छोटी रेणू 14 और खुशी 6 साल की है। इन बच्चियों को देखकर हर किसी की आंखें नम हो जाती हैं।
महेंद्र के भतीजे चरण सिंह ने बताया कि चाचा रंग-पेंट का काम करता था। उसके दो भाई भी यही काम करते हैं। तीनों भाई अपने परिवार के साथ गांव में ही रह रहे थे। अब उनके चले जाने के बाद घर खाने को दौड़ता है। तीनों बेटियों की पढ़ाई पर संकट आ गया है। बड़ी बेटी अगले साल बालिग हो जाएगी। कैसे उसकी कैसे शादी होगी, कैसे बच्चों का पालन-पोषण होगा, यह सोचकर ही डर लगता है।
बेटियां यही कहती हैं कि अगर इस तरह ही पिता और बहनों को छीनना था तो हमें इस दुनिया में भगवान ने भेजा ही क्यों। अभी तक कुछ संस्थाओं ने बेटियों की पढ़ाई का खर्च उठाने को कहा है, लेकिन कोई सरकारी मदद नहीं मिली है।
बहरोड़ क्षेत्र के कोहराना गांव में 21 मार्च, 2025 को उस समय दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, जब एक सड़क हादसे ने हरेंद्र कुमार और सुमित्रा देवी का इकलौता पुत्र लीलू उनसे दूर चला गया। सड़क हादसे में उसकी मौत हुई।
नारनौल रोड पर स्थित विधायक कार्यालय के सामने लीलू एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया। उसे घायलावस्था में अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वह बच नहीं सका। वह ड्यूटी खत्म होने के बाद घर लौट रहा था। उसकी मौत ने माता-पिता को जीवन भर का दर्द दिया है। उनके बुढ़ापे का सहारा छीन गया। लीलू के पिता हरेंद्र कुमार टैक्सी चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं, जबकि माता, सुमित्रा देवी गृहिणी हैं। लीलू की एक बहन का विवाह हो चुका है।
यह हादसा सड़कों पर सुरक्षा मानकों और यातायात नियमों के पालन की गंभीर आवश्यकता को रेखांकित करता है, ताकि लीलू जैसे किसी और परिवार का चिराग न बुझे। पिता को उस उम्र में परिवार का पालन-पोषण करना पड़ रहा है, जब उनकी घर पर आराम करने की उम्र है। माता-पिता इकलौते बेटे की मौत के बाद कैसे-जैसे जीवन काट रहे हैं। मां घर में अकेली होती है तो बच्चे की फोटो को देखकर रोती है। पिता रोते नहीं लेकिन उनके दिल की हालत वो ही जानते हैं।