मांडलवास गांव के तीन ओर सरिस्का का जंगल और एक हिस्से में गांव की जमीन है। इस गांव में लोगों की आजीविका का मुख्य साधन पशु पालन व खेती है। वर्ष 1984-85 में चार साल के अकाल ने गांव की कमर तोड़ दी थी। गांव के अधिकांश कुएं सूख गए और पशु काल के गाल […]
मांडलवास गांव के तीन ओर सरिस्का का जंगल और एक हिस्से में गांव की जमीन है। इस गांव में लोगों की आजीविका का मुख्य साधन पशु पालन व खेती है। वर्ष 1984-85 में चार साल के अकाल ने गांव की कमर तोड़ दी थी। गांव के अधिकांश कुएं सूख गए और पशु काल के गाल में समाने लगे। पानी के अभाव में खेत बंजर होने लगे।
ऐसे में अधिकतर लोगों ने रोजी-रोटी के लिए शहरों और महानगरों की ओर पलायन बेहतर समझा। इसी दौरान गांव के बुजुर्गों को पता चला कि एक संस्था है जो वर्षाजल संग्रहण का काम रही है। इस पर कुछ ग्रामीण तरुण भारत संघ के राजेन्द्र सिंह से मिले और उन्हें अपनी समस्या से अवगत कराया।
इसके बाद राजेन्द्र सिंह मांडलवास आए तो देखा कि गांव में मात्र एक पुराना जोहड़ होने के कारण बारिश का पूरा पानी बह जाता है। यदि बारिश के इस पानी को रोक लिया जाए तो यहां भू-जल स्तर में सुधार संभव है।
ग्राम सभा का गठन पहला सार्थक कदम
संस्था की प्रेरणा से गांव में 20 सदस्यों की एक ग्राम सभा का गठन किया गया। इसमेें प्रत्येक परिवार की हिस्सेदारी आवश्यक थी। इसके बाद प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए कानून एवं दस्तूर बनाए गए और सुनिश्चित किया गया कि पूरा गांव उनका पालन करेगा। गांव की समृद्धि के लिए जरूरी था कि गांव में 12 महीने पानी उपलब्ध हो।
जोहड़ बनाने के लिए किया प्रेरित
ग्रामीणों को जोहड़ बनाने के लिए प्रेरित किया गया। युवाओं को जोहड़ की पुरानी पद्धति को समझाया गया। इसके बाद ग्रामीणों ने संस्था के सहयोग से गांव के पास कुछ जोहड़ तैयार किए। इसका सकारात्मक प्रभाव देख ग्रामीणों ने हर वर्ष एक जोहड़ तैयार करने का प्रण भी ले लिया। इनके निर्माण में आवश्यक सामान और श्रम करने वालों की व्यवस्था ग्रामीणों ने स्वयं की।
इस तरह जगह-जगह जोहड़ बनने से पानी धरती की कोख में गया। धरती की प्यास बुझी तो धीरे-धीरे कुओं में भी पानी आने लगा। भू-जल स्तर में सुधार से क्षेत्र की हरियाली लौटने लगी। पलायन कर गए ग्रामीण वापस गांव का रुख करने लगे। ग्रामीण धीरे-धीरे तीन-तीन फसलें करने लग गए। आर्थिक स्तर में सुधार हुआ तो उन्होंने फिर से पशुपालन के पशुओं की संख्या बढ़ा दी। वहीं दूर-दूर से पानी लेकर आने वाली महिलाओं के भी दिन बहुर गए। अब वे गांव के कुओं से ही पानी ले सकती हैं।
रख-रखाव के लिए ग्राम कोष
जोहड़ों के रखरखाव के लिए मांडलवास में एक ग्राम कोष बनाया गया। इसमें प्रत्येक परिवार द्वारा साल में दो बार फसल तैयार होने पर अनाज दिया जाता है। वहीं बांध के पानी में मछली पालन का ठेका उठाया जाता है। इस कोष से जोहड़, बांध के रख-रखाव व सार्वजनिक कार्यों को किया जाता है।
परंपरागत ज्ञान के इस्तेमाल से बना लिया बांध
भगाणी नदी की एक धारा इस गांव से बहती है। ग्रामीणों ने इस पर एक बांध का निर्माण किया है। इसे बनाने में किसी तकनीक की जगह परंपरागत ज्ञान का इस्तेमाल किया गया। बांध से बारिश का पानी नदी के साथ बहने की जगह एकत्रित होकर धरती की कोख तक पहुंच रहा है। बांध के चलते यहां पूरे साल प्रचुर मात्रा में पानी उपलब्ध रहता है। पानी की उपलब्धता के चलते क्षेत्र में हरी घास खूब पनप गई है। यही नहीं बांध आसपास के कई गांवों के जलस्तर में भी सुधार आया है।
संकट की घड़ी में शरण भी दी
वर्ष 2001-02 के सूखे के दौरान पड़ोसी गांव जैतपुर, गोपालपुर, किशोरी, सीलीबावड़ी के ग्रामीणों ने पशुओं को साथ लेकर गांव में अश्रय लिया था। इस प्रकार मंडलवास खुद समृद्ध होने के साथ ही संकट के समय में पड़ोसी गांव की शरणस्थली भी बना।
कृषि भूमि का विस्तार, बढ़ी पैदावर
जोहड़ों के निर्माण का असर गांव में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इससे कृषि उत्पादों में वृद्धि के साथ ही कृषि भूमि का विस्तार भी हुआ है। पूरे साल गांव कुओं में पानी की उपलब्धता से किसान फसल को समय से पानी दे पाते हैं।
ग्रामीणों के अनुसार पहले एक बीघा जमीन में 280 से 300 किलोग्राम मक्का की पैदावार होती थी। जोहड़ बनने के बाद यह बढ़कर 400 किलोग्राम तक हो गई है। इसका एक कारण यह है कि क्षेत्र की कृषि भूमि की मिट्टी नमी रोकने योग्य हो गई है। इसके चलते किसान रबी की फसल भी करने लगे हैं।
अब साल भर कुओं में रहता है पानी
गजेन्द्र मीणा ग्रामीण ने बताया कि खेती और पशुपालन ही हमारी आय के प्रमुख साधन हैं। गांव में जोहड़ और बांध के निर्माण से हमारे हालातों में काफी सुधार आया है। अब साल भर कुओं में पानी उपलब्ध रहता है। इससे समय से फसलों की सिंचाई कर देते हैं। वहीं बांध के चलते पशुओं के लिए हरी की उपलब्धता बनी रहती है।
सरकार समुदाय को साथ लेकर करे काम
मौलिका सिसोदिया निदेशक तरुण भारत संघ ने बताया कि अभी तक जो अकाल हमने देखे हैं, आने वाले समय में शायद इससे बड़े अकालों सामना करना पड़ेगा। इसका एकमात्र समाधान विकेन्द्रीकृत समुदाय संचालित जल प्रबंधन ही है। मांडलवास की सफलता इसी प्रबंधन का एक उदाहरण है। जब तक लोग जलस्रोतों का अपना समझ उन्हें संरक्षित करने का प्रयास नहीं करेंगे तक तब बदलाव संभव नहीं है। ऐसे में जरूरत यह है कि सरकार समुदाय को साथ में लेकर जलसंरक्षण का कार्य करे।