
अलवर। नगर निगम के वार्ड सदस्यों (पार्षदों) के चुनाव में टिकट वितरण को लेकर भाजपा में बगावत शुरू हो गई है। शहर के चार में से दो मंडल अध्यक्षों ने अपनी पूरी कार्यकारिणी के साथ इस्तीफा दे दिया है। ये इस्तीफे भाजपा जिलाध्यक्ष को भेजे गए हैं। ये दोनों मंडल शहर के 65 में से 33 वार्डों को कवर करते हैं। इनमें श्री विवेकानंद मंडल 17 और श्री केशव मंडल 16 वार्डों को कवर करता है। इस संबंध में जिलाध्यक्ष अशोक गुप्ता को फोन किया, लेकिन उन्होंने रिसीव नहीं किया।
भाजपा के श्री विवेकानंद मंडल के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह राठौड़ समेत उनकी पूरी कार्यकारिणी के 15 सदस्यों ने इस्तीफा दिया है। जितेंद्र राठौड़ का कहना है कि वार्ड 25 से उन्होंने अपनी पत्नी हुकम कंवर के लिए टिकट मांगा था, लेकिन रमाकांत यादव को पार्टी ने टिकट दे दिया, जबकि वे अब तक दूसरे वार्ड से चुनाव लड़ते आए हैं। यह वार्ड अनारक्षित महिला के लिए रिजर्व है, फिर भी ओबीसी को टिकट दे दिया।
इसी तरह भाजपा श्री केशव मंडल के अध्यक्ष महेश निहलानी समेत उनकी कार्यकारिणी के आठ पदाधिकारी ने भी जिलाध्यक्ष को इस्तीफा भेजा है। उन्होंने कहा कि पार्टी की नीतियों के मुताबिक टिकटों का वितरण नहीं किया गया। बैठकों में कहा गया था कि मंडल अध्यक्षों और कार्यकारिणी से पूछकर ही टिकट वितरण होगा, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इधर, देर रात तक इस्तीफा देने वालों को भाजपा के कई नेता मनाने में जुटे थे।
वन राज्यमंत्री संजय शर्मा के खास माने जाने वाले वरिष्ठ भाजपाई सुरेश मेहता ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने लिखा है कि पार्टी को अनुभवी और पुराने नेताओं की जरूरत नहीं है। हमें घर बैठना चाहिए ताकि स्वार्थी और चापलूस लोगों को जगह मिल सके। उनकी यह पोस्ट नगर निगम चुनाव को लेकर बताई जा रही है। वे किसी मामले को लेकर नाराज हैं। हालांकि उन्होंने पोस्ट में यह साफ नहीं लिखा कि उनकी नाराजगी किस बात को लेकर है।
भाजपा ओबीसी मोर्चा के जिला महामंत्री विजेंद्र गुर्जर ने भी अपने पद और प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा जिलाध्यक्ष को भेजा है। इस्तीफे में लिखा है कि लंबे समय से पार्टी के लिए निष्ठापूर्वक कार्य कर रहे सामूहिक एवं जमीनी कार्यकर्ताओं की लगातार हो रही उपेक्षा तथा संगठन की वर्तमान कार्यशैली से कार्यकर्ताओं में गहरा असंतोष व्याप्त है। जब संगठन में निष्ठावान कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान और विचारों की रक्षा संभव न हो, तब पदों पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।