
अलवर. परखच्चे उड़ चुके सडक़ों पर चल रही जनता की सहन शक्ति और जिम्मेदारों की लापरवाही की हद पार हो चुकी है। रेलवे स्टेशन अलवर के बाहर निकलते ही काली मोरी फाटक की तरफ करीब 200 मीटर तक सडक़ नहीं यातना शिविर है। सडक़ में कई फीट गहरे गड्ढ़े, उनमें भरे कीचड़ से वाहनों के पहिए ही नहीं डिगमिगा रहे बल्कि मजबूरी में जनता ने रास्ते बदल लिए हैं। अलवर जंक्शन की तरफ जाने वाले लोग कलक्टर आवास के सामने से निकलने लगे हैं। उधर से आने वाले भी अपनी राह बदल चुके हैं। हालांकि सडक़ मार्ग वह भी ढंग का नहीं है। फिर भी जनता गिर-उठ कर आ-जा रही है।
देव नगर से आने वाली आठवीं कक्षा की छात्रा संजना व सातवीं कक्षा की छात्रा किरण दोनों बहन हैं। स्टार पब्लिक स्कूल में इसी रोड से साइकिल से जाती हैं। पिछले करीब आठ माह से साइकिल पर जाने की बजाय पैदल जाने को मजबूर हैं। साइकिल को घसीट कर ले जाना पड़ता है। संजना ने बताया कि इस रास्ते से दोनों साइकिल पर बैठकर जाने की सोच ही नहीं सकते। संजना साइकिल को पकडकऱ लेकर जाती है। किरण सडक़ के बगल से मकानों की दीवारों को पकड़ कर निकलती है। एक-दो बार साइकिल फिसली तो उसके बाद इनकी हिम्मत नहीं हो रही कि दोनों साइकिल पर बैठकर रास्ता पार कर लें। ये तो छोटी बालिकाएं हैं बड़ों के दुपहिया ही नहीं थ्री व्हीलर व चौपहिया वाहन भी डिगमिगा रहे हैं।
मौके से जनता की जुबानी जानिए
गिरने का लगता है डर
नौ महीने से देख रहा हूं। ई-रिक्शा मुश्किल से लाता हूं। हमेशा गिरने का डर रहता है। आप गड्ढे देखिए इतने बड़े हैं कि वाकई कभी भी कोई गिर सकता है। सावधानी हटते ही दुर्घटना घट जाएगी।
गिरीराज, ई-रिक्शा चालक
सडक़ ही नहीं बची
ईटाराणा में औद्योगिक इकाइयां हैं जो करोड़ों रुपया सरकार को टैक्स देते हैं। फिर भी पूरा रोड देखिए। कहीं सडक़ नहीं बची है। अब मिट्टी डालकर कीचड़ कर दिया।
हिमांशु महावर, बिजनेसमैन, अलवर
डरती हूं निकलने से
हम देव नगर से रोजाना इस रोडसे स्कूल को आते-जाते हैं। आप सडक़ देखिए क्या दोनों साइकिल पर बैठ कर निकल पाना संभव है। कतई नहीं। अकेली भी डरती हुई निकल रही हूं।
संजना, छात्रा, स्कूल