
राजकीय गीतानंद शिशु चिकित्सालय (फोटो - पत्रिका)
डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का दावा तब खोखला साबित हो गया, जब कागजों और कम्प्यूटर की लापरवाही ने एक बीमार बच्चे को इलाज से महरूम कर दिया। रामगढ़ निवासी 14 वर्षीय किशोर थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है। उसे हर दो से तीन महीने में रूटीन चेकअप और दवाइयों के लिए जयपुर ले जाना पड़ता है।
साथ ही नियमित अंतराल पर खून चढ़ाने की भी जरूरत रहती है। 17 अगस्त को परिजन उसे खून चढ़वाने के लिए अलवर के राजकीय गीतानंद शिशु चिकित्सालय लाए थे। आरोप है कि अस्पताल से उसे डिस्चार्ज तो कर दिया गया, लेकिन कर्मचारियों ने डिस्चार्ज की जानकारी ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज ही नहीं की।
इस लापरवाही का खामियाजा बच्चे और उसके परिवार को एक सितंबर को भुगतना पड़ा। परिजन नियमित जांच और दवा लिखवाने के लिए जयपुर के प्रसिद्ध जेके लोन अस्पताल पहुंचे। वहां पर्ची काउंटर पर जैसे ही पहचान पत्र के जरिए रिकॉर्ड देखा गया, सिस्टम ने बता दिया कि मरीज तो अभी भी अलवर के गीतानंद शिशु चिकित्सालय में भर्ती है।
पोर्टल पर पहले से भर्ती दिखने के कारण जयपुर में उसकी ओपीडी पर्ची नहीं बन पाई। पिता ने स्थिति समझाने की पूरी कोशिश की, लेकिन नियमों और डिजिटल सिस्टम के आगे उनकी एक न चली। आखिरकार बिना डॉक्टर को दिखाए उन्हें खाली हाथ वापस लौटना पड़ा।
तीन सितंबर को जब परिजन दोबारा खून चढ़वाने के लिए सुबह करीब 10 बजे अलवर के शिशु अस्पताल पहुंचे, तो वही ड्रामा फिर दोहराया गया। काउंटर पर कर्मचारी ने फिर कहा कि बच्चा पहले से ही अस्पताल में एडमिट दर्ज है। इसके बाद परेशान पिता वार्ड में पहुंचे और रिकॉर्ड की जांच करवाई। तब जाकर असलियत सामने आई कि 17 अगस्त को छुट्टी होने के बाद मरीज की फाइल ऑनलाइन अपडेट के लिए भेजी ही नहीं गई थी।
इसके बाद आनन-फानन में पुरानी फाइल ढूंढकर मंगवाई गई और रिकॉर्ड को ऑनलाइन दुरुस्त किया गया। इस पूरी भाग दौड़ में बेबस पिता करीब ढाई घंटे तक अस्पताल के चक्कर काटता रहा। जिस वक्त बच्चे को बेड पर आराम और खून की जरूरत थी, उस समय परिजन अस्पताल की बाबूगीरी और सिस्टम की गलती सुधारने में पसीना बहा रहे थे।
अस्पतालों को ऑनलाइन करने का मकसद यह था कि मरीज का पूरा ब्यौरा एक क्लिक पर हर जगह मिल सके। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अगर समय पर डेटा अपडेट न हो, तो यही आधुनिक व्यवस्था मरीजों के लिए आफत बन जाती है। जब तक मरीज को पोर्टल से डिस्चार्ज नहीं किया जाता, वह किसी दूसरे अस्पताल, पीएचसी या सीएचसी में इलाज के लिए वैध पर्ची तक नहीं कटवा सकता। समय रहते ऐसे लापरवाह रवैये पर रोक लगाना बेहद जरूरी है।
थैलेसीमिया के मरीज को रक्त चढ़वाने के लिए कम से कम 4 घंटे तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता है। रक्त चढ़ाने के बाद मरीज की दोबारा जांच की जाती है तथा उसका डिस्चार्ज कार्ड भी तैयार किया जाता है। योजना में निशुल्क इलाज के लिए मरीज की फोटो भी ली जाती है। संभव है कि मरीज बिना फोटो खिंचवाए ही अस्पताल से चला गया हो। इसकी जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी - डॉ. कंवरसिंह, एचओडी, राजकीय गीतानंद शिशु चिकित्सालय।
Updated on:
4 Sep 2026, 11:58 AM IST
Published on:
4 Sep 2026, 11:58 AM IST
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