'टॉपिक ऑफ द डे' कार्यक्रम में राजस्थान सरकार द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन के माध्यम से लाए गए विधेयक पर पत्रिका से की चर्चा
अंबिकापुर. पत्रिका के 'टॉपिक ऑफ द डे' कार्यक्रम में राजस्थान सरकार द्वारा लाए गए विधेयक को वापस लेने के संबंध में वरिष्ठ अधिवक्ता संजय अंबष्ट ने चर्चा की। उन्होंने बताया कि राजस्थान सरकार ने मंत्रियों, विधायकों व लोकसेवकों को संरक्षित करने दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन के माध्यम से विधेयक लाया था। समय रहते इसका राजस्थान पत्रिका द्वारा पूरजोर विरोध करने पर सरकार को यह विधेयक वापस लेना पड़ा। इसके लिए राजस्थान पत्रिका बधाई की पात्र है।
संजय अंबष्ट ने बताया कि यह विधेयक वैसा ही था जैसे विधानसभा के सदन में विधायकों का वेतन बढ़ाने का विधेयक लाना। इसका विरोध सदन में कोई नहीं करेगा।
राजस्थान सरकार का इस विधेयक को लाने का मकसद यह था कि लोकसेवक, विधायक, मंत्री व अन्य राजनेता पर यदि कार्य के दौरान कोई आरोप लग जाए या अपराध दर्ज हो जाए तो उसका नाम, पता व पहचान मीडिया में तब तक उजागर न हो जब तक कि अभियोजन की स्वीकृति शासन से न मिल जाए।
उन्होंने बताया कि वे शासन भी खुद हैं और पद पर भी बैठे हैं तो स्वीकृति कौन देता। यदि मीडिया द्वारा उसकी पहचान उजागर की जाती है तो धारा 228-बी के तहत दंडात्मक प्रावधान है।
पत्रिका ने उठाया मुद्दा तो आना पड़ा बैकफुट पर
संजय अंबष्ट ने बताया कि दंड प्रक्रिया संहिता 156-3 में प्रावधान है कि जब कोई किसी मामले का अपराध दर्ज कराने थाने में जाता है और थानेदार उसकी रिपोर्ट नहीं लिखता है तो वह एसपी के पास जाता है। एसपी के पास धारा 154-3 के तहत पावर होता है कि वह थानेदार को निर्देशित करे। यदि दोनों ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की तो रिपोर्टकर्ता के पास यह अधिकार होता है कि वह उस क्षेत्राधिकार के मजिस्ट्रेट के पास जाकर इसकी जानकारी दे।
वह यह कह सकता है कि उसने संज्ञेय अपराध की जानकारी दी थी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में मजिस्ट्रेट को यदि लगता है तो वह 156-3 के तहत थानेदार को विवेचना व अपराध दर्ज करने का आदेश करता है। उन्होंने बताया कि इस पर भी रोक लगाने का उपबंध राजस्थान सरकार द्वारा किया गया था। इसे पत्रिका ने उठाया तो सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा।