अंबिकापुर

Chhath puja CG: जानिए क्यों रखा जाता है छठ का कठिन व्रत, 4 दिन तक कैसे होती है पूजा

सूर्य देवता की पूजा का चार दिवसीय छठ पर्व का नहाय-खाय से हुआ आगाज, अंबिकापुर के घाट, तालाब व बांधों में उमड़ेंगे श्रद्धालु

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अंबिकापुर. छठ महापर्व का उल्लास शहर में दिखने लगा है। बिहार व उत्तरप्रदेश के बाद सबसे धूमधाम से यह पर्व अंबिकापुर में मनाया जाता है। छठ पूजा पर शहर के तालाबों के साथ-साथ शंकर घाट और बांधों पर भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। धन, ऐश्वर्य और परिवार की सुख शांति और संपन्नता के लिए महिलायें ४ दिनों के कठिन व्रत को रखती है।


छठ के 4 दिवसीय पर्व का आगाज मंगलवार को नहाय खाय से शुरू हो गया। व्रत के पहले दिन सेंधा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी ग्रहण किया जाता है। बुधवार से उपवास आरम्भ हो जाएगा। व्रती दिनभर अन्न-जल त्याग कर शाम करीब सात बजे खीर बनाकर, पूजा करने के उपरान्त प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे खरना कहते हैं।

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गुरुवार को अस्ताचलगामी सूर्य को अघ्र्य अर्पण किया जाएगा। शुक्रवार को उदयमान भास्कर को अघ्र्य देकर व्रत का पारण होगा। छठ पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे जल भी ग्रहण नहीं करते।


4 दिन ऐसे होती है छठ में पूजा
छठ पूजा का पहला दिन नहाय-खाय के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफ ाई कर उसे पवित्र किया जाता है। फि र छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू.दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है।


दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रती महिलाएं दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करती हैं। इसे खरना कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आसपास के भी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है।

इसमें नमक या शक्कर का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता
कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ का प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं। चढ़ावा के रूप में लाया गया सांचा और फ ल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।

शाम को पूरी तैयारी के साथ बांस की टोकरी में अघ्र्य का सूप सजाया जाता है। व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अघ्र्य देने घाट पर जाते हैं। सभी व्रती सामूहिक रूप से अघ्र्य दान करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अघ्र्य दिया जाता है। छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है।


चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदीयमान सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। व्रती वहीं पुन: इक_ा होते हैं, जहां उन्होंने पूर्व संध्या को अघ्र्य दिया था। पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति की जाती है। व्रती घर आकर गांव में पीपल के पेड़ के पास जाकर पूजा करते हैं। पूजा के पश्चात् व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं।

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Published on:
24 Oct 2017 05:24 pm
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