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chhath puja : लोक परंपरा के अनुसार चार दिवसीय इस आयोजन के पहले दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को पूरे घर की विशेष रूप से साफ-सफाई कर छठ व्रती स्नान कर भोजन में कद्दू-चनादाल और चावल ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। इसे 'नहाय-खाय' के रूप में मनाया जाता है। दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे 'खरना' कहा जाता है। प्रसाद में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और रोठ (घी की विशेष) रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद में चावल के लड्डू भी बनाते हैं। चढ़ावे के रूप में लाया गया सांचा और फल भी छठ प्रसाद में शामिल होते हैं।
chhath puja : माना जाता है कि छठ पर्व मनाने की शुरुआत महाभारत काल में कर्ण ने की थी। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अघ्र्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। आज भी छठपर्व के दौरान सूर्यदेव को अघ्र्य दान की कर्ण प्रणित पद्धति ही प्रचलित है। भगवान कृष्ण के पौत्र शाम्ब को कुष्ठ हो गया था। इस रोग से मुक्ति के लिए उन्होंने विशेष रूप से सूर्योपासना की और वे रोग मुक्त हुए। महाभारत काल में पांडवों की पन्नी द्रौपदी द्वारा भी सूर्यपूजा करने का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि वह अपने पतियों व परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं। जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए तो द्रौपदी ने छठ व्रत से अर्जित तप के बल पर अपने पतियों को उनकी खोई प्रतिष्ठा वापस दिलाई। ऐसा कई धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है।
Published on:
22 Oct 2017 09:43 am
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