अनूपपुर

छठ पूजा: डूबते सूर्य को अध्र्य देकर माताओं ने संतान व परिजनों की सुख समृद्धि का मांगा आशीष

चार दिनों की व्रत में आज सुबह उगते सूर्य को अध्र्य देकर होगी व्रत की समाप्ति, नदीघाटों पर पूजन के लिए पहुंचे लोग

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Nov 21, 2020
Chhath Puja: Mothers sought blessings for the happiness and prosperity
छठ पूजा: डूबते सूर्य को अध्र्य देकर माताओं ने संतान व परिजनों की सुख समृद्धि का मांगा आशीष

अनूपपुर। सूर्य उपासना, संतान प्राप्ति व संतान की मंगलकामना की इच्छा से रखे जाने वाले छठ पूजा व्रत में शुक्रवार को माताओं ने जिला मुख्यालय के सामतपुर तालाब सहित पसान, बिजुरी, राजनगर, कोतमा की पूजा घाट पर डूबते सूर्य को अध्र्य देकर संतान व परिजनों की सुख समृद्धि की कामना का आशीष मांगा। सूर्यदेव की बहन षष्ठी को समर्पित सूर्य उपासना का यह पर्व अगली सुबह उगते सूर्य को अध्र्य चढ़ाने के साथ समाप्त होगा। इन दोनों ही पहर(शाम और सुबह) में नदी-तालाबों पर बने घाटों पर कमर तक भरे पानी में माताएं खड़ी होकर सूर्य को नमस्कार करने के साथ धरती पर जीवन देने वाले प्रकृति संसाधन और सूर्य की किरणों से रोशन होने वाली सृष्टि के लिए धन्यवाद देती है और इसी सृष्टि में अपने परिवार के सदस्यों के सुखमय जीवन, पति की लम्बी आयु और संतान प्राप्ति की कामनाओं को लेकर सूर्य का आह्वान करती है। जिसमें उनकी मनोकामना पूर्ण होने पर वह हमेशा सूर्यदेव की उपासना करती रहेगी कहती है। पर्व में व्रतियों द्वारा विशेष प्रसाद ठेकुआ, चावल के लड्डू, मिठाई सहित मौसमी फल बांस की बनी हुई टोकरी (डाला) में डालकर देवकारी में रखा जाता है। पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल, पांच प्रकार के फल और पूजा का अन्य सामान लेकर डाला को घर का पुरुष अपने हाथो से उठाकर छठ घाट पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो इसलिए इसे सिर के ऊपर की तरफ रखते है। ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएं यह व्रत रखती हैं। छठ व्रत के सम्बन्ध में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए तब श्रीकृष्ण द्वारा बताए जाने पर द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था। तब उनकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को उनका राजपाट वापस मिला था। लोक परम्परा के अनुसार सूर्यदेव और छठी मइया का सम्बन्ध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी।
हालंाकि छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। भैया दूज के कल होकर चतुर्थी को नहाय खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन डूबते सूर्य को अध्र्य तथा चौथा दिन उगते सूर्य को अध्र्य देकर व्रत की समाप्ति के साथ सम्पन्न होता है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। जिसमें वे पानी भी ग्रहण नहीं करते। छठ पर्व कार्तिक मास शुक्ल पक्ष के पष्ठी को मनाया जाने वाला हिन्दू पर्व है, सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। कहा जाता है यह पर्व बिहारीयों का सबसे बड़ा पर्व है ये उनकी संस्कृति है।
बॉक्स: छठ पर्व एक तपस्या
छठ व्रत एक कठिन तपस्या की तरह है। व्रत रखने वाली महिलाओं को परवैतिन कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रति को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाए गए कमरे में व्रति फर्श पर एक कम्बल या चादर के सहारे ही रात बिताती हैं। जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की गई होती है, व्रति को ऐसे कपड़े पहनना अनिवार्य होता है। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। छठ पर्व को शुरू करने के बाद सालों साल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला इसके लिए तैयार न हो जाए। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।
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Published on:
21 Nov 2020 11:11 am