अशोकनगर

कम उम्र में शादी, जवानी में खोया पति… चंदेरी की आसमा ने आंसुओं को बनाया ताकत, सिलाई मशीन से बुना बच्चों का भविष्य

Ashma Parveen Success Story: कम उम्र में शादी, पति को खोने का दर्द और तीन बच्चों की जिम्मेदारी के बावजूद आसमा परवीन ने हार नहीं मानी। आज वे महिलाओं को न्याय दिलाने और समाजसेवा में जुटी हैं।
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Oct 16, 2026
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Ashma Parveen Success Story: चंदेरी की आसमा ने आंसुओं को बनाया ताकत (फोटो सोर्स- Patrika)

Ashma Parveen Success Story: जिंदगी जब किसी को कम उम्र में ही कड़े इम्तिहानों के भंवर में धकेल दे, तो अक्सर लोग टूट जाते हैं, लेकिन चंदेरी की आसमा परवीन उन चंद सह, साहसी लोगों में से हैं, जिन्होंने आंसुओं को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। कम उम्र में शादी, ससुराल की बेरुखी और फिर जवानी में ही पति के साये से महरूम हो जाने का दर्द… ये सब एक आम महिला को तोड़ने के लिए काफी था, लेकिन आसमा ने न सिर्फ इन हालातों से लड़कर तीन बच्चों का भविष्य संवारा और पीड़ित महिलाओं के लिए न्याय की आवाज भी बन गई। आज वे चंदेरी और आसपास के इलाकों में महिला सशक्तीकरण की एक जीती-जागती मिसाल है।

रक्तदान और पर्यावरण संरक्षण में भी आगे

आसमा की समाजसेवा केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। उनके भीतर इंसानियत और प्रकृति के प्रति गहरा प्रेम है। किसी भी जरूरतमंद की जान बचाने वे अब तक 35 बार रक्तदान कर चुकी हैं। इस निस्वार्थ सेवा के लिए उन्हें लायंस क्लब और पूर्व में तत्कालीन एसपी द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है। पर्यावरण संरक्षण में भी वह काम कर रही है। आसमा परवीन का सफर इस बात का प्रमाण है कि इंसान की इच्छाशक्ति और हौसला हर मुश्किल को बौना साबित कर सकता है। वे केवल एक सफल मां नहीं, बल्कि उस समाज के लिए एक प्रेरणा बन गई हैं, जो अक्सर विपरीत परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देता है।

समाजसेवा के बाल विवाह की पीड़ा से संकल्प तक

आसमा ने जब आठवीं की परीक्षा पास की थी, तभी उनके हाथ पीले कर दिए गए। ससुराल में उन्हें वह जगह और सम्मान नहीं मिला, जिसकी वह हकदार थीं। इसी संघर्षपूर्ण दौर में उनकी मुलाकात अर्चना सक्सेना से हुई, जो उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। आसमा ने महसूस किया कि उनके जैसी कई महिलाएं घुट-घुट कर जीने को मजबूर हैं। उन्होंने नव दिशा सहारा महिला मंडल और अल्पसंख्यक बुनकर स्वयं सहायता समूह से जुड़कर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की ठानी। अब तक वे घरेलू हिंसा से पीड़ित 18 महिलाओं को उनका हक और न्याय दिला चुकी हैं।

सिलाई मशीन से बुना बच्चों का सुनहरा भविष्य

पति के असामयिक निधन के बाद तीन बच्चों की परवरिश का पहाड़ जैसा बोझ आसमा के कंधों पर आ गया। हार मानने के बजाय, उन्होंने सिलाई को अपना हथियार बनाया। वे सिलाई शिक्षिका बनीं और पाई-पाई जोडकर दिल्ली दरवाजा क्षेत्र के पास अपना खुद का मकान खड़ा किया। संघर्ष के इस दौर में उन्होंने खुद की पढ़ाई भी नहीं छोड़ी और 2010-11 में अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। उनकी इसी तपस्या का फल है कि आज उनकी बड़ी बेटी ने एमटेक किया है, छोटो बेटी ने जोधपुर से टेक्सटाइल डिजाइनिंग की शिक्षा ली है और बेटे ने बायोलॉजी में ग्रेजुएशन के साथ डीएमएलटी का कोर्स कर अपने पैरों पर खड़े होने की राह चुनी है।

Updated on:
16 Oct 2026 10:13 am
Published on:
16 Oct 2026 10:13 am