
Kaushal Mahal: ऐतिहासिक नगरी की हवाओं में आज भी एक अधूरे ख्वाब की गूंज सुनाई देती है। यह गाथा है एक ऐसे महल की, जिसे सात मंजिलों को छूने का गुरूर था, लेकिन वक्त की आंधियों ने इसे बीच में ही थाम लिया। हम बात कर रहे हैं चंदेरी के रहस्यमयी कौशक महल की। पांच सदियों से अधूरा खड़ा यह महल आज भी किसी लोकगाथा के उस नायक की तरह है, जिसका सफर अधूरा तो है, लेकिन उसकी कहानी अमर है।विशेष शैली में गढ़े गए इस महल के ऊंचे मेहराबदार द्वार, विशाल प्रांगण और नक्काशीदार झरोखे आज भी पर्यटकों को उस स्वर्णिम दौर में ले जाते हैं।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि सुल्तान ने इसे सात मंजिला बनाने का फरमान जारी किया था, लेकिन वक्त की चाल ऐसी पड़ी कि केवल तीन मंजिलें ही पूरी हो सकीं और चौथी का कुछ हिस्सा ही आकार ले पाया। सूर्यास्त के वक्त जब सुनहरी धूप चूना और बलुआ पत्थर की इन मोटी दीवारों से टकराती है, तो ऐसा लगता है मानो हर खामोश पत्थर अपना इतिहास खुद बयां कर रहा हो।
पीढिय़ों से यह किस्सा सुनाया जाता रहा है कि यह महल 1445 ई. में मालवा के सुल्तान महमूद शाह खिलजी प्रथम ने जौनपुर विजय के प्रतीक स्वरूप बनवाया था। लेकिन इतिहासकार डॉ. अविनाश कुमार जैन के ताजा शोध ने इस धारणा को बदल दिया है। शोध में हिजरी 895 (सन 1489-90) के फारसी शिलालेख मिले हैं, जिनमें तत्कालीन अधिकारी खान-ए-आजम शरफ खान शहनगी, रजा शम्स फतह और लेखक शिवसिंह गोलहार का जिक्र है। सबसे चौंकाने वाला तथ्य है कि दीवारों पर सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी के सिपहसालार रहे चंदेरी के सूबेदार मलिक मल्लू सुल्तानी का नाम 36 बार उकेरा गया है। जिसने साबित कर दिया है कि महल का वास्तविक निर्माण सुल्तान गयासुद्दीन के शासनकाल सन 1489-90 में ही हुआ था।
राजवंश बदले, सत्ता के केंद्र खिसके और कई हुक्मरान मिट्टी में मिल गए, लेकिन चंदेरी की वादियों में कौशक महल अपने अधूरे वैभव के साथ आज भी सीना ताने खड़ा है। आज कौशक महल की टूटी-फूटी बालकनियों से चंदेरी नगर को निहारते हुए यही महसूस होता है मानो यह इमारत कह रही हो कि इतिहास कभी अधूरा नहीं होता, बस अधूरे सपने उसे और भी यादगार बना देते हैं।