इस बंदरगाह को लेकर अब श्रीलंका पर लगातार कर्ज बढ़ता जा रहा है, दूसरी तरफ यह बंदरगाह पहले से ही चीन के कब्जे में हो चुका है।
कोलंबो। चीन से कर्ज लेकर 'हंबनटोटा पोर्ट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट' को विकसित करने का श्रीलंका का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट उसके लिए मुसीबत बनता जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने जब भी चीन से लोन और अन्य मदद मांगी उसे इनकार नहीं किया गया। फिजिबलिटी रिपोर्ट में कहा गया कि यह बंदरगाह काम नहीं करेगा। इस बंदरगाह को लेकर अब श्रीलंका पर लगातार कर्ज बढ़ता जा रहा है, दूसरी तरफ यह बंदरगाह पहले से ही चीन के कब्जे में हो चुका है।
लगातार बढ़ी लागत, फिर भी प्रोजेक्ट फेल
एक विदेशी अखबार के मुताबिक बंदरगाह का निर्माण कार्य काफी लंबे समय तक चला, जिसके चलते इसकी लागत भी तेजी से बढ़ गई। इस निर्माण कार्य के लिए चीनी कंपनी चाइना हार्बर इंजीनियरिंग लिमिटेड से कई बार करार हो चुका है, यह भी लागत बढ़ने की बड़ी वजह है। कई बार करार होने के बावजूद इस प्रोजेक्ट को फेल घोषित किया जा रहा है।
...ऐसे उलझा श्रीलंका चीन के जाल में
- 2012 में हंबनटोटा से सिर्फ 34 जहाज ही निकले और उसके बाद यह बंदरगाह चीन का हो गया।
- लगातार लागत बढ़ने से श्रीलंका पर कर्ज का बोझ बढ़ता गया।
- चीन के साथ कई दौर की बातचीत और भारी दबाव के बाद पिछले साल दिसंबर में श्रीलंका ने 15 हजार एकड़ जमीन 99 साल के लिए सौंप दी।
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छोटे देशों के लिए खतरनाक है ड्रैगन
चीन छोटे देशों को मदद के जरिए अपने प्रभाव में लेता है और वहां अपनी मजबूत पकड़ बना लेता है। गौरतलब है कि हाल ही में कनाडा ने भी चीन की इस चाल को लेकर पड़ोसी देशों को सतर्क किया था। इसी तरह से चीन नेपाल में भी अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश कर रहा है। एक कनाडाई अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक न्यूजीलैंड भी चीन के दुष्प्रभाव का शिकार होता जा रहा है।