कांग्रेस द्वारा सपा के जीते हुए विधायक को मध्यप्रदेश में मंत्री न बनाए जाने के बाद समाजवादियों का रास्ता साफ हो गया है।
औरैया. कांग्रेस द्वारा सपा के जीते हुए विधायक को मध्यप्रदेश में मंत्री न बनाए जाने के बाद समाजवादियों का रास्ता साफ हो गया है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने खुद बुधवार को इस बात को माना और साफ किया कि यूपी में गठबंधन गैर-कांग्रेस होगा। ऐसे में महागठबंधन के लिए सीटों पर एक और दावेदार कम हो गया है और सपा व बसपा अब आराम से बिना किसी परेशानी के आपस में बंटवारा कर सकती है। सीटों के बंटवारे को लेकर उठने वाली समस्याएं अब कमोबेश हल हो गई है, हालांकि सवाल उठता है कि आखिर किन सीटों पर दोनों पार्टियों में बंटवारा होगा। वैसे मुनासिब तो यही होगा कि 2014 के चुनाव में जिस पार्टी का जिस क्षेत्र में पलड़ा भारी रहा, वहां उसी का प्रत्याशी उतारा जाए। इससे दोनों दलों में स्थानीय असंतोष भी कम ही उभरेगा।
2014 चुनाव में पार्टियों का यह था हाल-
2014 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो भाजपा ने 71 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। जबकि उसके सहयोगी अपना दल को दो सीटें मिली थीं। सपा के खाते में 5 तो दो कांग्रस के खाते में सीटें गई थी लेकिन, 2019 का चुनाव आने तक यह आंकड़ा बदल गया है। यूपी में हुए तीन उप चुनावों में भाजपा की हार ने उनकी सीटें घटकर अब 68 रह गई हैं, जबकि सपा की 7 और अब रालोद के पास भी एक सीट है। वर्तमान में जिन सात सीटों पर सपा के सांसद हैं, वहां भी उसकी ही दावेदारी बनी रहेगी। वहीं 2014 चुनाव में बसपा और सपा की बात करें तो ये दोनों 34 व 31 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थीं। इस तरह प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में 65 को लेकर शायद ही कोई विवाद सामने आए। कांग्रेस छह, आप और रालोद एक-एक सीट पर रनरअप रही थी। बाकी 7 सीटों पर भाजपा दूसरे स्थान पर रही थी।
सपा व बसपा का रूख साफ-
कांग्रेस के प्रति अखिलेश के रूख के बाद से यह साफ माना जा रहा है कि मोटे तौर पर सीटों का बंटवारा सपा, बसपा और रालोद के बीच ही होगा। कांग्रेस से गठबंधन पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने भले ही अपना आखिरी निर्णय न सुनाया हो, लेकिन पार्टी को लेकर उनका तल्ख रुख पहले से ही स्पष्ट है। वह भी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की बेरुखी से नाराज हैं।
सपा-बसपा इन जिलों में उतारेंगी अपने प्रत्याशी-
सूत्रों की मानें तो सपा-बसपा के अलावा जिन सीटों पर दूसरी पार्टियां दूसरे पायदान पर रही थीं, उन पर खासतौर से जातीय समीकरण, भाजपा व कांग्रेस के प्रत्याशी को देखते हुए गठबंधन का प्रत्याशी फाइनल किया जाएगा। ऐसे में सूत्रों का कहना है कि पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी सहित लखनऊ, कानपुर, गाजियाबाद, बाराबंकी, कुशीनगर व सहारनपुर जैसी सीटों पर सपा-बसपा में से कोई भी पार्टी चुनाव लड़ सकती है। हालांकि, वाराणसी, कानपुर व लखनऊ से सपा और गाजियाबाद, कुशीनगर, सहारनपुर व बाराबंकी से बसपा के चुनाव लड़ने की संभावनाएं ज्यादा है।
रालोद को बागपत, मथुरा व कैराना सीटें मिल सकती हैं। जहां उपचुनाव में रालोद ने कैराना सीट भाजपा से झटकी है वहीं 2014 में मथुरा सीट पर पार्टी दूसरे स्थान पर रही थी। वर्तमान में भाजपा की कब्जे वाली बागपत सीट वर्षों से रालोद के पास ही रही है। पिछले चुनाव में सपा यहां दूसरे स्थान पर रही थी। वहीं सोनिया गांधी व राहुल गांधी के खिलाफ रायबरेली व अमेठी लोकसभा सीट पर पहले भी सपा चुनाव नहीं लड़ती थी इसलिए अबकी भी इन दोनों सीटों पर गठबंधन का उम्मीदवार न होने की ही पूरी उम्मीद है।