
Delhi-Dehradun Expressway Toll Charges : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन किया है। इस एक्सप्रेस-वे की कुल लंबाई 212 किलोमीटर है। इस पूरे एक्सप्रेस-वे की लागत 12000 करोड़ के आसपास आई है। यह एक्सप्रेस-वे 6 लेन है। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे देश का पहला वाइल्डलाइफ कॉरिडोर है। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे पर शुरुआत में 18 किलोमीटर तक कोई टोल नहीं है।
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे पर दिल्ली से देहरादून की 212 किलोमीटर दूरी कार से तय करने पर हर किलोमीटर लगभग 3 रुपए का टोल लगेगा। मतलब 212 किलोमीटर जाने पर आपको 675 रुपए का टोल देना होगा। वहीं अगर आप 24 घंटे में ही वापसी करते हो तो आपको 335 रुपए देने होंगे।
वहीं कामर्शियल वाहन, मिनी बस आदि के लिए टोल 1100 रुपए रखा गया है। बड़ी बस और ट्रक के लिए ये 2275 रुपए रखा गया है। इससे ज्यादा भारी वाहनों का टोल करीब 4 हजार रुपए हो जाता है।
इस एक्सप्रेसवे का टोल थोड़ा ज्यादा जरूर है, लेकिन इसके पीछे ठोस वजहें हैं। यह 6-लेन का एक्सप्रेसवे करीब 210 किलोमीटर लंबा है और इसकी कुल लागत लगभग 12,000 करोड़ रुपये है। खास बात यह है कि यह एक्सप्रेसवे शिवालिक के घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों से होकर गुजरता है। ऐसे चुनौतीपूर्ण इलाके में आधुनिक तकनीक और कठिन इंजीनियरिंग का इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे निर्माण की लागत काफी बढ़ गई। हालांकि समय की बचत को देखते हुए कई यात्रियों के लिए यह अतिरिक्त खर्च वाजिब माना जा रहा है।
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे 4 साल में बनकर तैयार हुआ। यह एक्सप्रेस-वे 12 हजार करोड़ की लागत से बनकर तैयार हुआ। इस एक्सप्रेस-वे का 64 प्रतिशत हिस्सा यूपी से होकर गुजरता है। 212 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेस-वे पर 113 अंडरपास, 5 रेलवे ओवरब्रिज और 62 बस शेल्टर बनाए गए हैं। यात्रियों की सुविधा के लिए बस शेल्टरों में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। एक्सप्रेस-वे पर 16 एंट्री-एग्जिट पॉइंट बनाए गए हैं।
वन्यजीवों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए राजाजी टाइगर रिजर्व और शिवालिक क्षेत्र में एक्सप्रेस-वे को पूरी तरह एलिवेटेड बनाया गया है। यहां लगभग 12 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड सेक्शन बनाया गया है, जो गणेशपुर (हरिद्वार) से आशारोड़ी (देहरादून) के बीच स्थित है।
यह एशिया में जंगल के अंदर बना अब तक का सबसे लंबा एलिवेटेड एक्सप्रेस-वे है। इसके बनने से वाहन ऊपर से तेज गति से गुजरेंगे, जबकि नीचे से जंगली जानवर (बाघ, हाथी, हिरण आदि) बिना किसी बाधा के अपना पारंपरिक रास्ता इस्तेमाल कर सकेंगे।