बैंगलोर

जीवन में सह-अस्तित्व से ही चलता है परिवार, समाज और देश

व्यक्ति जब एकाकी हो जाता है और परिवार से कटकर सामाजिकता खत्म हो जाती है तो ऐसी बीमारियां हावी हो जाती हैं
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Updated: 29 Sep 2018, 7:00 PM IST
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जीवन में सह-अस्तित्व से ही चलता है परिवार, समाज और देश

बेंगलूरु. वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ चिकपेट शाखा के तत्वावधान में गोडवाड़ भवन में रविंद्र मुनि ने शुक्रवार को वर्तमान में बढ़ रहे डिप्रेशन यानी अवसाद की बीमारी का उल्लेख करते हुए कहा कि इसकी वजह व्यक्ति के अलग-थलग रहने की प्रवृत्ति है। व्यक्ति जब एकाकी हो जाता है और परिवार से कटकर सामाजिकता खत्म हो जाती है तो ऐसी बीमारियां हावी हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि एकांतवास में रहना अल्प समय के लिए तो ठीक है, लेकिन लंबे समय तक यह बीमारियां दे देता है।

मुनि ने कहा कि जहां लोग समूह में रहेंगे वहां विचारों के विवाद भी हो जाते हैं। अनेक प्रकार की समानता और असमानता का जिक्र करते हुए मुनि ने कहा कि समाज समूह में रहने वाले व्यक्ति के लिए जरूरी है कि समाज में सभी के सहयोग से संपूर्णता हो और इसी संपूर्णता में सभी को रहना चाहिए। सामाजिकता में सह अस्तित्व की भावना को महत्व देने की सीख देते हुए मुनि ने कहा कि अस्तित्व से ही परिवार समाज और देश चलता है।

उन्होंने कहा कि समाज में परस्पर एक दूसरे के योगदान को मान-सम्मान देना चाहिए। अस्तित्व की भावना को मन मानस में बिठाना चाहिए। जीवन की चेतना के दो प्रकार के स्तरों का वर्णन करते हुए रविंद्र मुनि ने कहा कि दो प्रकार की चेतना वाले लोग हर परिवार समाज व राष्ट्र में होते हैं। यह व्यक्तिवादी चेतना और सामुदायिक चेतना वाले लोग। उन्होंने व्यक्तिवादी चेतना को त्यागने की प्रेरणा देते हुए हम की भावना रखने की सीख दी।

साथ ही कहा कि सामुदायिक चेतना में व्यक्ति सभी का सहयोग धन्यवाद व सभी की आवश्यकता को महसूस करता है। सामुदायिक भावना को बढ़ाने पर जोर देते हुए मुनि ने कहा कि अपने अहंकार को छोड़ते हुए व्यक्ति को समाज में एकजुटता रखनी चाहिए। संगठन समाज के लिए देव गुरु धर्म के प्रति समर्पण व अच्छी भूमिका अदा करनी चाहिए।

साथ ही मस्तिष्क चेतना को सामुदायिक बनाने का प्रयास करना चाहिए। इससे पूर्व संत ने प्रभु प्रेम से भरा भजन सुनाया। उन्होंने अपने प्रवचन में वीतराग वाणी का बखान करते हुए पीड़ा संवेदना खेद व्यक्त करने के मर्म को समझाया। मुनि ने कहा कि किसी की पीड़ा को महसूस करके ही व्यक्ति दुख व्यक्त करता है। 84 लाख योनियों में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो स्वयं के अलावा इंसान के रूप में दूसरों के दुख को समझता है, महसूस
करता है। उन्होंने कहा कि धार्मिक होने का लक्षण है कि जीवन के मूलभूत कर्तव्य को जानना। धर्म ग्रंथों व संतों को संकुचित बनाकर चारदीवारी संप्रदाय का कारण व्यक्ति का दुर्भाग्य है।

धर्मसभा में रवीन्द्र मुनि ने मांगलिक प्रदान की। चिकपेट शाखा के महामंत्री गौतमचंद धारीवाल ने बताया कि धर्म सभा में दिल्ली-रोहिणी, मुम्बई, सूरत, आमेट, मेवाड़, उदयपुर सहित शहर के विभिन्न उपनगरीय संघों से बड़ी संख्या में श्रद्धालू मौजूद रहे। चिकपेट शाखा के सहमंत्री सुरेश मूथा ने संचालन किया। चिकपेट महिला शाखा की समस्त टीम ने शुक्रवार को यहां के विभिन्न स्थानकों में साधु व साध्वियों के दर्शन कर आशीर्वाद लिया।

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