बैंगलोर

दांव पर धरम की विरासत और खरगे की प्रतिष्ठा

कलबुर्गी का हाल
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Updated: 10 May 2018, 7:35 PM IST
kalburgi

राजेन्द्र गहरवार

कलबुर्गी. विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री धरम सिंह की विरासत और लोकसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की प्रतिष्ठा दांव पर है। दोनों के बेटे कड़े मुकाबले में फंसे हुए हैं। चुनाव का ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन कलबुर्गी जिले के इन दोनों राजनीतिक घरानों के मतदान से पहले पसीने छूट रहे हैं। कर्नाटक-हैदराबाद क्षेत्र की सबसे हाईवोल्टेज यही दो सीटें हैं, जिनपर सभी की निगाहें टिकी हैं।
चित्तापुर सीट से दूसरी बार मैदान पर उतरे मल्लिकार्जुन के बेटे प्रियांक खरगे पर्यटन और आईटी मंत्री हैं, क्षेत्र के मतदाताओं की नाराजगी के चलते उन्हें भाजपा प्रत्याशी वाल्मीकि नाइक से कड़ी चुनौती मिल रही है। चित्तापुर से महज आठ किलोमीटर दूर स्थित दंडोती गांव के निवासी बाबूराव पहले तो चुनाव का माहौल ठीक होने की बात करते हैं। खुलने पर बताते हैं यहां तो कांग्रेस के भीतर ही गड़बड़ है।

उन्होंने बताया अभी 25 दिन पहले पंचायत चुनाव में कांग्रेस के पास ज्यादा नंबर थे, फिर भी चेयरमैन भाजपा का बन गया, आपस में ही अविश्वास है। विकास हमारे गांव में नहीं हुआ, इससे निराशा है। वोट किधर जाएगा, उन्हें नहीं पता। चित्तापुर में मोबाइल शॉप चलाने वाले युनूस कहते हैं, पिछली बार जैसा एकतरफा चुनाव नहीं है। टक्कर कड़ी है पर पलड़ा कांग्रेस का ही भारी है। वेंकट दूसरी बात बताते हैं, वे कहते हैं अगड़ी जातियां खरगे के खिलाफ हैं। इसमें लिंगायत भी शामिल हैं, अगर मतदान तक ऐसा ही रहा तो कुछ भी हो सकता है। कांग्रेस के लिए राहत की बात यही है कि जद ध का प्रत्याशी नहीं है, समझौते में यह सीट बसपा को मिली है। इसके प्रत्याशी देवराज वीके को लेकर अधिक चर्चा नहीं है।


कांग्रेस का गढ़ जेवर्गी कितना अजेय
कर्नाटक-हैदराबाद क्षेत्र में जेवर्गी सीट कांग्रेस का गढ़ जानी जाती रही है। राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके दिवंगत कांग्रेस नेता धरम सिंह नौ बार यहां से जीते। 2008 में आखिरी चुनाव महज 60 मतों से हारने के बाद संन्यास ले लिया था। अब यहां की विरासत उनके बेटे डॉ अजय सिंह के हाथों में है। 2013 का विधानसभा चुनाव बड़े अंतर से जीते, लेकिन इस बार त्रिकोणीय मुकाबले में फंसे हुए हैं। सबसे तगड़ी चुनौती केदारलिंगइया हीरथ जद ध प्रत्याशी से मिल रही है। पिता को हराने और बेटे से हारने वाले भाजपा प्रत्याशी दोड्डप्पा गौड़ा ए पाटिल फिर सामने हैं। लिंगायत बाहुल्य इस सीट में महज एक हजार राजपूत वोटर हैं, ऐसे में अजय सिंह पिता के करिश्मे के भरोसे ही हैं।

मतदाताओं की नाराजगी दबी जुबान बाहर निकल रही है। विजयराज कहते हैं, अजय में पिता वाली बात नहीं है। पांच साल में काम नहीं किया, इसलिए लोग नाराज हैं। मो. रियाज इस बात को काटते हुए कहते हैं, काम तो हुए हैं। दल या जाति देखकर नहीं बल्कि जरूरत के हिसाब से काम किया है। विकास हुआ है पर वे यह भी मानते हैं कि अभी आधा काम होना बाकी है। इस सीट पर लिंगायत और ब्राम्हण भाजपा के लिए लामबंद हो रहे हैं, ऐसा मतदान तक भी रहा तो अजय की मुश्किलें बढ़ेंगीं।

धरम सिंह ऐसे रहे सुर्खियों में मुख्यमंत्री रहते मध्यप्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती के 1994 के हुब्बली दंगे के केस को खुलवाकर धरम सिंह ने उत्तर भारत की राजनीति में तहलका मचा दिया था। कोर्ट के वारंट पर सीएम पद से इस्तीफा देकर कर्नाटक आईं उमा ने जमानत लेने से इनकार कर दिया था। उमा भारती जब तक जेल से बाहर आईं उनकी राजनीतिक दुनिया बदल चुकी थी। 2003 में भारी बहुमत से भाजपा को सत्ता में लाने वाली उमा सरकार भर से ही नहीं बल्कि भाजपा से भी निर्वासित हो गईं थीं। बाद में उन्होंने अलग दल बनाकर संघर्ष किया था।

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