
मैसूरु. वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ सिद्धार्थ नगर सीआइटीबी परिसर में श्रुत मुनि ने कहा कि अनंत उपकारी चौबीस तीर्थंकर ने जो वाणी अपने अनुभव, विचार बताए है उन्हें हम अमृत मैत्री, आगम वाणी कहते हैं। मनुष्य यदि शुद्ध भाव, मन, वचन, काया की शुद्धता द्वारा अरिहंत परमात्मा सिद्ध भगवान, गुरुओं एवं महापुरुषों की श्रद्धा से निर्मल भावों के विचारों से स्तुति की जाए तो का जीवन सफल होता है।
कमलाबाई खमेसरा ने 11 उपवास एवं बाबूलाल खमेसरा ने 7 उपवास के प्रत्यख्यान ग्रहण किए। महिला मंडल की अध्यक्ष पुष्पाबाई लोढ़ा, मंत्री भारतीबाई मेहता ने कमलाबाई को तपस्या की चुंदड़ी ओढ़ाकर सम्मान किया। 2 सितम्बर को महिला अधिवेशन होगा।
जैन वाङमय में चित्त का अर्थ चेतना
बेंगलूरु. तेरापंथ भवन यशवंतपुर में मुनि रणजीत कुमार व मुनि रमेश कुमार के सान्निध्य में मनाए जा रहे 'अध्यात्म सप्ताहÓ में गुरुवार को 'चित्त समाधि के सूत्रÓ विषय पर प्रवचन हुए। मुनि रणजीत कुमार ने कहा कि जैन वाङमय में चित्त का अर्थ चेतना है, आत्मा है। भव्य-अभव्य, स्थूल, सूक्ष्म, संज्ञी-असंज्ञी आदि अनेक रूपों में अभिव्यक्त होती है। जिसमें चेतना है वह चित्र है। मुनि रमेश कुमार ने कहा कि चेतना एक है वह अनावृत नहीं है। इसलिए उसकी रश्मियां सीधी प्रसारित नहीं होती। उसे माध्यम चाहिए। उसके निकट का सूक्ष्मतम माध्यम अध्वसाय है। चेतना की पहली हलचल का उद्गम यहीं होता है। उसका आकलन बहुत कठिन है। चित्त को समाधि तक ले जाने में तीन बड़ी बाधाएं व्याधि, आधि और उपाधि को पार करने के पश्चात ही समाधि की भूमिका में पहुंचा जा सकता है।
मधुर भाषी हो श्रावक
बेंगलूरु. चामराजपेट में साध्वी वीणा ने कहा कि श्रावक को मधुर भाषी होना चाहिए। वाणी ही वह शक्ति और विलक्षणता है, जो मानव को शेष सृष्टि से श्रेष्ठ बनाती है। इसलिए संत जन कहते हैं कि मानव की वाणी में कोयल जैसी मधुरता होनी चाहिए। कोयल अपनी वाणी की मधुरता से सबका मन मोह लेती है। मीठी वाणी में मधुरता और सत्यता को अपना कर सबका प्यारा और सम्मानीय बन सकता है। वह वाणी द्वारा दूसरों को भी सुख शांति प्रदान करता है। साध्वी अर्पिता ने 18वें पाप मिथ्यात्वदर्शन शल्य के बारे में बतायासाध्वी वीरकांता ने मंगलपाठ सुना सभी को आशीर्वाद प्रदान किया। माणकचंद रुणवाल ने स्वागत किया।