बैंगलोर

कन्या मंडल अधिवेशन में शामिल हुईं विजयनगर की सदस्य

जिसमें बेंगलूरु के विजयनगर कन्या मंडल से 35 कन्याएं शामिल हुईं
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कन्या मंडल अधिवेशन में शामिल हुईं विजयनगर की सदस्य

बेंगलूरु. अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल की ओर से चेन्नई में कन्या मंडल अधिवेशन आयोजित हुआ, जिसमें बेंगलूरु के विजयनगर कन्या मंडल से 35 कन्याएं शामिल हुईं। अधिवेशन में कई प्रतियोगिताएं व रोचक कार्यक्रम हुए। साध्वी कल्पलता, साध्वी विश्रुतप्रभा ने विशेष प्रशिक्षण दिया। आचार्य महाश्रमण एवं महाश्रमणी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। कन्या मंडल संयोजिका मधु कटारिया, किरण बोराणा, शेफालिया पितलिया, सरोज टांटिया आदि मौजूद रहीं।


समभाव में रहना सीखें
बेंगलूरु. जयमल जैन श्रावक संघ की ओर से महावीर धर्मशाला में आयोजित धर्मसभा में जयधुरंधर मुनि ने कहा कि व्यक्ति को अनुकूल, प्रतिकूल, सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय, सम्पत्ति-विपत्ति आदि सभी परिस्थितियों में समभाव में रहना चाहिए। समभाव में रमण करने वाला व्यक्ति समस्त विवादों का हल निकालने में सक्षम हो जाता है। उन्होंने कहा कि परिस्थिति को बदलना इतना आसान नहीं होता है, परंतु मन:स्थिति को बदलना जीव के स्वयं के हाथ में रहता है।

जीवन में चाहे कैसे भी उतार-चढ़ाव आए तनाव की स्थिति में न जाते हुए उसे झेलने की क्षमता होनी चाहिए। विकटग्रस्त अवस्था में तनावग्रस्त होना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। प्रारंभ में जयकलश मुनि ने गीतिका का संगान किया। जयधुरंधर मुनि ने वरिष्ठ प्रवर्तक रूपमुनि का गुणानुवाद करते हुए कहा कि वे कवि, रवि, जपी, तपी, करुणामूर्ति, उदारता के अवतार व सरल स्वाभिमानी संतरत्न थे। संघ अध्यक्ष मीठालाल मकाणा, चिकपेट संघ अध्यक्ष चेतन प्रकाश डुंगरवाल आदि ने श्रद्धाांजलि अर्पित की।

मन से सांसारिक विचारों को निकालना जरूरी
मैसूरु. सुमतिनाथ जैन संघ के महावीर भवन में आयोजित धर्मसभा में प्रवचन देते हुए आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि धर्म तीर्थ की स्थापना करके तारक तीर्थंकर परमात्मा जगत के जीवों पर महान उपकार करते हैं। इस जगत में जो कुछ भी शुभ है, सुख है, वह सब तीर्थंकर परमात्मा का ही प्रभाव है।

उन्होंने कहा कि उनके द्वारा बताए मार्ग के अनुसरण से ही जीवात्मा को पुण्य बंध होता है, जो जगत के सुख का मुख्य कारण है। आचार्य ने कहा कि जिस प्रकार एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती हैं, एक गुफा में दो केसरी सिंह नहीं रह सकते हैं, उसी प्रकार एक ही मन में एक साथ परमात्मा और संसार-दोनों की प्रतिष्ठा नहीं हो सकती है। अत: परमात्मा के साथ संबंध जोडऩा हो तो मन में से संसार के विचारों को बाहर निकालना जरूरी है।

Published on:
21 Aug 2018 06:03 pm
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