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जैन धर्म को जन का धर्म बनाया

मुनि रणजीत कुमार ने कहा कि वे सर्वमान्य लोक संत थे
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जैन धर्म को जन का धर्म बनाया

बेंगलूरु. जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, यशवंतपुर के तत्वावधान में और मुनि रणजीत कुमार एवं मुनि रमेश कुमार के सान्निध्य में वरिष्ठ प्रवर्तक रूपमुनि रजत की स्मृति सभा का आयोजन तेरापंथ भवन में हुआ। मुनि रणजीत कुमार ने कहा कि वे सर्वमान्य लोक संत थे। उन्होंने संयम का जीवन जिया।

जैन परम्परा विशेष रूप से श्रमण संघ के प्रभावशाली चमत्कारी संत थे। उन्होंने जैन धर्म को जन धर्म बनाया। छत्तीस कौम उनकी भक्त थी। सभी समाज के विकास में उन्होंने जो कार्य किए हैं वे सदा स्मरणीय रहेंगे। तेरापंथ धर्मसंघ के साथ उनका निकटतम संबंध रहा है। मुनि रमेश कुमार ने कहा कि उनका बचपन से ही धर्म, अध्यात्म, साधना और धमाचार्यों से संपर्क रहा। वे अपनी तरह के सिद्धि प्राप्त फक्कड़संत थे।

जैन समाज ही नहीं,अपितु जैनेत्तर समाज ने भी उनके उपदेशों और शिक्षाओं को स्वीकार किया। विद्यालय, अस्पताल, गोशाला आदि उपक्रमों से जन-जन के प्रिय बने। ऐसे जनप्रिय संत को समाज सदैव स्मृति करेगा। इससे पूर्व तेरापंथ सभा के अध्यक्ष प्रकाश चन्द बाबेल, शांतिलाल बोराणा, शांति सकलेचा, बिन्दु रायसोनी आदि ने विचार व्यक्त किए।

मुनि रणजीत कुमार एवं मुनि रमेश कुमार के सान्निध्य में रविवार से स्वास्थ्य सप्ताह का शुभारंभ हुआ। स्वास्थ्य का आधार खाद्य संयम विषय पर मुनिद्वय ने प्रेरक वक्तव्य दिए। आशा पारख ने ग्यारह की तपस्या के प्रत्याख्यान किए। तेरापंथ सभा, तेरापंथ महिला मंडल ने आशा पारख को साहित्य भेंट कर सम्मानित किया।

बिन्दु रायसोनी ने आठ दिन की तपस्या के प्रत्याख्यान किए। खाद्य संयम के महत्व को बताते हुए मुनि रणजीत कुमार ने कहा कि जीवन धारण करने के पश्चात सभी को आहार की, भोजन की आवश्यकता रहती है। जैन दर्शन में ओज, रोम व केवल आहार का उल्लेख मिलता है। जिह्वा की आसक्ति से जो भोजन करते हैं वे स्वास्थ्य को गौण कर देते हैं। खाने- पीने के अविवेक के कारण अनेक बीमारियां बढ़ती हैं। स्वस्थ जीवन शैली के लिए खाद्य संयम का विवेक जरूरी होता है। तभी व्यक्ति अपने आप को स्वस्थ रख सकता है।

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