बाड़मेर में तेज रफ्तार, नशे में ड्राइविंग और ढीली कार्रवाई के कारण सड़क हादसों ने कई परिवार उजाड़ दिए। कहीं माता-पिता एक साथ खत्म हुए, कहीं बच्चों से पिता का साया छिन गया। कई घरों में कमाऊ चिराग बुझ गए।
बाड़मेर: सड़क हादसे…एक पल की चूक, एक लापरवाही और नतीजा यह कि किसी का पूरा परिवार बिखर जाता है। किसी मां की गोद उजड़ जाती है, किसी बच्चे का भविष्य अंधेरे में डूब जाता है और किसी बुजुर्ग के सहारे का हाथ अचानक छूट जाता है।
आंकड़ों में दिखने वाली मौतें दरअसल किसी एक परिवार की पूरी दुनिया को खत्म कर देती है। बाड़मेर में पिछले समय में हुए हादसों ने कई घरों के चिराग बुझा दिए, कई मासूमों की हंसी छीन ली और बुजुर्ग माता-पिता को ऐसे अकेलेपन में धकेल दिया, जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो सकेगी।
सबसे ज्यादा चुभने वाली बात यह है कि हादसों की यही कहानी बार-बार दोहराई जा रही है। कारण साफ है कि नशे में गाड़ी चलाना, तेज रफ्तार, ओवरलोडिंग और सिस्टम की ढीली कार्रवाई। हादसे होते हैं, घर उजड़ते हैं और दोषी अक्सर बच निकलते हैं। परिवार रोते रह जाते हैं और सड़कें किसी की सांसें छीन लेने वाली खामोश गवाही बनकर रह जाती हैं।
शहर के कल्याणपुरा निवासी भगवानदास और सामूदेवी कुछ माह पहले सड़क हादसे का शिकार हुए। एक ही हादसे में मां-पिता चले गए और पीछे रह गए चार बच्चे, दर्द और आर्थिक तंगी। हादसे के समय छोटा बेटा कार्तिक और बेटियां पायल व जयंती भी साथ थे।
गंभीर घायल ये तीनों अब तो ठीक हैं, लेकिन जिन आंखों ने माता-पिता को खोते हुए देखा हो, वे आंखें फिर वैसी कभी नहीं हो सकती। बड़ा बेटा प्रवीण यह कहते हुए भर आया कि एक पल में माता-पिता चले गए, हम चार भाई-बहन जैसे अनाथ हो गए। अब छोटी बहनों की शादी भी करनी है। न आर्थिक सहारा है, न मां-बाप की छांव बची।
उसकी पीड़ा यहीं खत्म नहीं होती। वह बताता है कि सिस्टम की लापरवाही ने दर्द को और गहरा कर दिया कि मेरे पिता का बाहरवां भी नहीं हुआ था कि थाने पहुंचने पर पता चला कि टक्कर मारने वाला ट्रक छोड़ दिया गया। भाई-बहन घायल थे, इलाज में भी परेशानियों का पहाड़ खड़ा कर दिया। जब तक सिस्टम में रिश्वतखोरी खत्म नहीं होगी, हादसे ऐसे ही परिवार बर्बाद करते रहेंगे।
मेगा हाइवे पर एक माह पहले हुए भीषण हादसे में कार में सवार चार लोग जिंदा जल गए। इनमें मोहन सिंह भी थे। उनके दो छोटे बच्चे एक 7 वर्ष का, दूसरा सिर्फ 4 वर्ष का। आज भी यह समझ नहीं पाए हैं कि पापा अब क्यों नहीं आ रहे। घर में रहने वाली बुजुर्ग मां का सहारा भी उसी मोहन सिंह की कमाई थी।
हादसे के बाद से पत्नी, बच्चे और मां जैसे जीते-जी टूट चुके हैं। मोहन सिंह दो भाइयों में छोटे थे, बड़ा भाई अलग रहता है। ऐसे में परिवार का पूरा बोझ, छोटे बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और मां की देखभाल सब उनकी पत्नी के कंधों पर आ गिरा है। हादसे ने एक पुरुष को नहीं, पूरे परिवार को बुरी तरह झकझोर दिया है।
तीन दिन पहले शहर के युवा जयंत बोहरा उर्फ चिंटू की सड़क हादसे में मौत हो गई। परिवार का सबसे बड़ा बेटा, माता-पिता की उम्मीद, और व्यापार में हाथ बटाने वाला सहारा, सब कुछ था चिंटू। मां-बाप ने उसे बड़े लाड़ से पाला, पढ़ाया-लिखाया, अच्छे भविष्य के सपने देखे थे।
पिता के काम में वह साथ देता और खुद का कारोबार शुरू कर चुका था। लेकिन एक पल के हादसे ने सब खत्म कर दिया। अब मां-पिता की आंखों में सिर्फ पछतावा, दर्द और एक अंतहीन खालीपन है। जो बेटा सहारा बनने वाला था, उसी का कंधा हमें उठाना पड़ गया, यही असहनीय सत्य आज बोहरा परिवार जी रहा है।
शहर के निकटवर्ती रबारियों की ढाणी निवासी भवरू देवासी की सड़क हादसे में मौत ने उनके दो मासूम बेटों से पिता का साया छीन लिया। बड़ा बेटा श्रवण इस समय 12वीं कक्षा का विद्यार्थी है। पढाई, घर और जिम्मेदारियां सब अचानक उसके कंधों पर आ गई हैं। श्रवण की आवाज आज भी कांप जाती है कि पापा ही मेरी दुनिया थे।
हादसा क्या होता है, यह मेरा दिल जानता है। हर दिन, हर वक्त उनकी याद आती है। कई बार रात में नींद नहीं आती और आंखों से आंसू गिरने लगते हैं। बस एक बात कहना चाहता हूं कृपया नशे में वाहन मत चलाएं। उसकी यह बात केवल एक बच्चे की गुहार नहीं, बल्कि हर उस परिवार की पुकार है जो हादसे में अपने लोगों को हमेशा के लिए खो चुका है।
नशे में वाहन चलाना, तेज रफ्तार, नियमों की अनदेखी और ढीली कार्रवाई, ये चार बातें आज भी बाड़मेर की सड़कों पर मौत बनकर घूम रही हैं। हादसे के बाद कार्रवाई नहीं के बराबर होती है।
कई मामलों में दोषी पलभर में छूट जाते हैं और पीड़ित परिवारों को महीनों तक अस्पतालों, थानों और दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। इन हादसों में सिर्फ जानें नहीं जा रहीं भविष्य खत्म हो रहे हैं, सपने टूट रहे हैं और परिवार सालों-साल दर्द झेलने को मजबूर हैं।