
राजस्थान में चल रहे पंचायती राज चुनाव 2026 के बीच बाड़मेर जिले के गडरा रोड पंचायत समिति से प्रशासनिक लापरवाही और चुनावी प्रक्रिया में गंभीर अनियमितता का एक विवादास्पद मामला सामने आया है। दरअसल, गडराारोड ग्राम पंचायत में सरपंच पद के चुनाव के दौरान नामांकन संवीक्षा के समय रिटर्निंग अधिकारी द्वारा खारिज किए जा चुके आवेदनों को कथित तौर पर उपखंड अधिकारी (SDO) के हस्तक्षेप के बाद दोबारा सही मानकर स्वीकार कर लिया गया। इतना ही नहीं, खारिज सूची से वापस दौड़ में शामिल हुए प्रत्याशियों में से एक प्रत्याशी पूराराम न केवल चुनाव लड़े, बल्कि 187 वोटों के अंतर से सरपंच पद पर विजयी भी घोषित हो गए।
निर्वाचन अधिकारी द्वारा विजयी प्रत्याशी को जीत का प्रमाण पत्र थमाकर शपथ दिलाए जाने के बाद अब यह पूरा मामला कानूनी और प्रशासनिक पचड़े में फंस गया है। रिजेक्शन लिस्ट नोटिस बोर्ड पर चस्पा होने के बाद किस नियम के तहत पर्चा दोबारा स्वीकार किया गया, इसे लेकर जिला निर्वाचन अधिकारी एवं बाड़मेर कलक्टर चिन्मयी गोपाल ने कड़ा संज्ञान लेते हुए पूरे मामले की प्रशासनिक जांच करवाने के निर्देश जारी कर दिए हैं।
गडराा रोड ग्राम पंचायत में सरपंच पद के लिए कुल 21 अभ्यर्थियों ने अपने नामांकन पत्र दाखिल किए थे। नामांकन पत्रों की संवीक्षा के दौरान रिटर्निंग अधिकारी ने दस्तावेजों की जांच की और 2 आवेदनों में गंभीर कमियां पाते हुए उन्हें खारिज कर दिया।
पहला खारिज आवेदन: वार्ड संख्या 5 निवासी पूराराम पुत्र दयाराम का था, जिसके आवेदन पर टिप्पणी लिखी गई थी कि परिशिष्ट 6डी/उपबंध 1बी में दी गई जानकारियां अपूर्ण हैं।
दूसरा खारिज आवेदन: वार्ड संख्या 8 निवासी कपिल कुमार पुत्र मोहनलाल का था, जिसमें नाम व हस्ताक्षर में कांट-छांट और साक्षी के हस्ताक्षर न होने के कारण रिजेक्ट किया गया था।
रिटर्निंग अधिकारी के आधिकारिक हस्ताक्षर होने के बाद इन दोनों प्रत्याशियों के नाम के साथ अस्वीकृत आवेदनों की सूची मतदान केंद्र के बाहर सार्वजनिक रूप से चस्पा भी कर दी गई थी।
नोटिस बोर्ड पर रिजेक्ट लिस्ट चस्पा होने के बाद अचानक पूरे घटनाक्रम ने नाटकीय मोड़ ले लिया। आरोप हैं कि गडराारोड के उपखंड अधिकारी (SDO) सुरेश कुमार मेघवाल के मौखिक या प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद दोनों खारिज आवेदनों को एकाएक दुरुस्त मानकर चुनाव लड़ने की हरी झंडी दे दी गई।
जब मतदान की प्रक्रिया संपन्न हुई और मतपेटी से वोट निकले तो खारिज सूची से वापस मैदान में लौटे पूराराम को कुल 1786 वोट मिले। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी (जिन्हें 1599 वोट मिले) को 187 वोटों के अंतर से शिकस्त दे दी।
जीत के बाद निर्वाचन अधिकारी ने पूराराम को पद एवं गोपनीयता की शपथ भी दिला दी। लेकिन अब यह सवाल उठ रहा है कि एक बार खारिज हो चुके पर्चों को दोबारा स्वीकार करने की कानूनी प्रक्रिया क्या थी और इसके पीछे किस अधिकारी की क्या भूमिका रही।
गडराारोड पंचायत चुनाव में सामने आई इस गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और प्रक्रियागत उल्लंघन का मामला जैसे ही जिला मुख्यालय पहुंचा, बाड़मेर की जिला निर्वाचन अधिकारी एवं कलक्टर चिन्मयी गोपाल ने मामले को गंभीरता से लिया।
जिला कलक्टर चिन्मयी गोपाल ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा:, "मामला संज्ञान में आने के तुरंत बाद जांच के निर्देश दिए गए हैं। संबंधित एसडीओ से घटनाक्रम की पूरी जानकारी मांगी गई है। चुनाव प्रक्रिया में असल में क्या हुआ था और किस स्तर पर लापरवाही या गलती रही है, इसकी निष्पक्ष जांच करवाई जाएगी और नियमानुसार कार्रवाई होगी।"
इस पूरे विवाद के बाद बाड़मेर के स्थानीय राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है। कानून के जानकारों और पूर्व जन प्रतिनिधियों का कहना है कि पंचायती राज चुनाव नियमों के तहत एक बार रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा संवीक्षा में पर्चा निरस्त करने और उसकी आधिकारिक सूची चस्पा करने के बाद केवल उच्च स्तर या राज्य निर्वाचन आयोग/अदालत के लिखित आदेश से ही बदलाव संभव होता है।
यदि प्रशासनिक दबाव या व्यक्तिगत हस्तक्षेप से निरस्त पर्चे को वापस स्वीकार किया गया है, तो यह सीधे तौर पर चुनावी शुचिता और नियमों का उल्लंघन है। पराजित प्रत्याशी अब इस मामले को लेकर हाई कोर्ट या चुनाव याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं, जिससे गडराारोड का यह सरपंच चुनाव रद्द होने के मुहाने पर खड़ा दिख रहा है।