
रतन दवे
राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र यानि करीब पचास हजार की आबादी से जुड़ा चिकित्सा का बड़ा केन्द्र। जहां चिकित्सा विभाग की ओर से पचास-पचास लाख की लागत के भवन बनाए हुए हैं। इनमें पर्याप्त कक्ष, बेड और अन्य सुविधाएं हैं। यहां तक की जच्चा-बच्चा की सुरक्षा सहित अब तो शल्य सुविधाएं भी हैं। एेसे में इन भवनों को इतना अपर्याप्त कैसे मान लिया जाए कि पोस्टमार्टम के लिए यहां एक कक्ष न हो।
कई जगह अलग से मोर्चरी फिलहाल नहीं है लेकिन विकल्प के तौर पर किसी अन्य बंद कमरे में पोस्टमार्टम हो सकता है। जवाब इसका भी दिया जाए कि अस्पताल के बरामदे में भी तो पर्दा लगाया जा सकता था। गडरारोड स्थित सीएचसी में तामलोर की दो महिलाओं का पोस्टमार्टम जिस अमानवीय तरीके से किया गया उसमें जिम्मेदारों ने थोड़ी सी संवेदना क्यों दिखाई? परिजन ने आपत्ति उठाई तो यह कैसा तर्क हुआ कि मोर्चरी नहीं है तो यहीं पर पोस्टमार्टम होगा।
सामने आए वीडियो और फोटो स्पष्ट कर रहे हंै कि पर्दा नाममात्र था बाकि संवेदनहीनता बेपर्दा थी। चिकित्सा महकमे के मुखिया यह कहकर घटना पर पर्दा डाल रहे हैं कि मोर्चरी नहीं थी। निर्माण चल रहा है। पर्दे लगाए गए थे,जबकि उनका दायित्व बनता है कि वे स्पष्ट तौर पर कहें कि अगर किसी ने गलती की है उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।
चिकित्सा का कार्य मानवीय संवेदना से जुड़ा है और यहां संवेदनाओं के साथ खिलवाड़ करना तो कतई गवारा नहीं होना चाहिए। लेकिन यहां घटना का पोस्टमार्टम न हो इसके लिए विभाग ने पहले से बचाने की तैयारी कर ली है।
कानून में शव को भी गरिमा का पूरा अधिकार है। आर्टीकल 21 में स्पष्ट है कि जिस तरह जीवित रहने हुए व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंचती है, वैसी ही मृत्यु के बाद ठेस पहुंचती है तो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 499 के तहत कार्रवाई होती है। शव के साथ हुए व्यवहार से परिजन को ठेस पहुंचे या दु:ख हो तो वे संबंधित के खिलाफ एफआईआर कर सकते हैं।
सड़क पर शव रखकर किसी का पोस्टमार्टम हो तो जाहिर है परिजन को बुरा ही लगेगा। इस मामले में भी बुरा लगा लेकिन यह कहकर चुप करवा दिया कि यहां तो रोज ही ऐसे होता है। यानि यह गलती पहली नहीं है। इसको यहां के चिकित्सकों ने आदत में डाल लिया है। जिले में 23 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र हैं। इसमें से 10 हाईवे के चिकित्सालयों पर अब मोर्चरी की सुविधा मांगी गई है।
चिकित्सा महकमे की अदूरदर्शिता ही कही जाएगी कि 108 की सुविधा, 25 मरीजों को दाखिल करने के बेड, शिशु-महिला स्वास्थ्य और शल्य तक की सुविधाएं अस्पताल में है तो फिर जाहिर है यहां पोस्टमार्टम के मामले भी आते रहते हैं।
दुर्घटनाओं और बढ़ते अपराध के चलते हर हफ्ते एक-दो मामले अधिकांश सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर आ रहे हैं। एेसे में लाखों के भवन बनाए गए तो मोर्चरी का प्रस्ताव पहले क्यों नहीं लिया गया? मोर्चरियां तो जब बनेंगी तब बनेंगी लेकिन जरूरी है कि इस घटना का पोस्टमार्टम हो। खुले में सड़क पर पोस्टमार्टम जिले के चिकित्सा इंतजाम पर काला धब्बा है....।