शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी की सुरक्षा में राज्य सरकार ने अचानक बड़ी कटौती कर दी है। इस आदेश ने सियासी हलकों में 'राजनीतिक प्रतिशोध' की चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
राजस्थान के सबसे चर्चित युवा विधायक रविंद्र सिंह भाटी एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार वजह उनका कोई आंदोलन नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा में अचानक की गई कटौती है। बाड़मेर जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय से जारी एक आधिकारिक पत्र ने प्रदेश की राजनीति में हड़कंप मचा दिया है। आदेश के अनुसार, विधायक भाटी को दी गई अतिरिक्त सुरक्षा वापस ले ली गई है। अब उनके पास 4 के बजाय केवल 1 पीएसओ तैनात रहेगा।
जिला पुलिस अधीक्षक (SP) चूनाराम जाट द्वारा हस्ताक्षरित आदेश संख्या 1568 (दिनांक 13 अप्रैल 2026) के मुताबिक, इंटेलिजेंस इनपुट और राज्य सरकार के पुराने आदेशों का हवाला देते हुए यह कार्रवाई की गई है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि पूर्व में भाटी को मिली धमकियों के मद्देनजर 1 पीएसओ के अतिरिक्त 3 अन्य सुरक्षाकर्मी दिए गए थे। लेकिन अब सरकार के नए निर्देशों के तहत प्रत्येक सांसद और विधायक को केवल एक-एक पीएसओ ही उपलब्ध कराया जाना है। इसी की पालना में भाटी की अतिरिक्त सुरक्षा को 'प्रत्याहारित' (Withdraw) कर लिया गया है।
राजनीतिकविश्लेषक इस घटनाक्रम को भाटी के हालिया 'ओरण बचाओ आंदोलन' से जोड़कर देख रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से रविंद्र सिंह भाटी जैसलमेर-बाड़मेर के ओरण की जमीनों को बचाने के लिए सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाए हुए थे। उनके आंदोलन ने प्रशासन और सरकार की चिंता बढ़ा दी थी।
बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि कुछ समय पहले ही इंटेलिजेंस इनपुट में रविंद्र सिंह भाटी की जान को खतरा बताया गया था। उन्हें सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से लगातार धमकियां मिल रही थीं। ऐसे में जब खतरा बरकरार है, तो सुरक्षा बढ़ाना तो दूर, उल्टा कम कर देना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। क्या इंटेलिजेंस ने अब भाटी को 'खतरे से बाहर' मान लिया है या यह फैसला केवल तकनीकी आधार पर लिया गया है?
जैसे ही सुरक्षा कटौती का आदेश सार्वजनिक हुआ, रविंद्र भाटी के समर्थकों ने सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। समर्थकों का कहना है कि भाटी देशभर में दौरे करते हैं और बड़ी जनसभाओं को संबोधित करते हैं, ऐसे में केवल एक गनमैन के भरोसे उनकी सुरक्षा करना उनके जीवन को जोखिम में डालना है।
पुलिस प्रशासन का तर्क है कि यह केवल नियमों की पालना है और सभी विधायकों के लिए समान नीति अपनाई जा रही है। लेकिन भाटी की बढ़ती लोकप्रियता और उनके खिलाफ मिल रही धमकियों के विशेष मामले को देखते हुए, यह दलील उनके समर्थकों के गले नहीं उतर रही है।