
राजस्थान की राजनीति में अपने आक्रामक और जन-केंद्रित तेवरों के लिए पहचाने जाने वाले शिव विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने आगामी पंचायती राज चुनावों से ठीक पहले एक बार फिर सियासी पारा गर्मा दिया है। विधायक भाटी ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग EWS के लिए आरक्षण व्यवस्था में व्यावहारिक सुधार और सरलीकरण की मांग को लेकर बाड़मेर से एक बड़े प्रदेशव्यापी आंदोलन का आधिकारिक आगाज कर दिया है। बाड़मेर से शुरू हुई यह 'घर-घर संपर्क यात्रा' बालोतरा, आसोतरा, सिणधरी और गुड़ामालानी जैसे प्रमुख इलाकों से होते हुए सांचौर तक पहुंचेगी। इस यात्रा के जरिए भाटी सीधे तौर पर ग्रामीण जनता और युवाओं के बीच पहुंच रहे हैं, जिससे पारंपरिक राजनीतिक दलों यानी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (BJP) दोनों की नींद उड़नी तय मानी जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायती राज चुनावों की आहट के बीच भाटी का यह कदम केवल ईडब्ल्यूएस तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे मारवाड़ और पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण वोट बैंक की नब्ज टटोलने की एक सोची-समझी रणनीति भी है। भाटी का यह आक्रामक तेवर युवाओं और सवर्ण-सामान्य वर्ग के उन मतदाताओं के बीच गहरी पैठ बना रहा है जो लंबे समय से प्रशासनिक जटिलताओं से जूझ रहे हैं। इस पूरी मुहिम को लेकर अब यह सवाल सबसे बड़ा बन गया है कि क्या रविंद्र सिंह भाटी का यह तेवर स्थानीय चुनावों में कांग्रेस और बीजेपी के पारंपरिक वोटों में बड़ी सेंध लगा पाएगा?
विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण केवल एक सरकारी प्रावधान नहीं है, बल्कि यह हजारों प्रतिभाशाली युवाओं के भविष्य और उनके बुनियादी अधिकारों का गंभीर सवाल है। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में कई ऐसी व्यावहारिक अड़चनें हैं, जिनके कारण जरूरतमंद युवाओं को इसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। भाटी की ओर से उठाई गई प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं-
उत्पादकता और स्थानीय मूल्य का आधार: भूमि के केवल आकार को पात्रता का पैमाना बनाने के बजाय उसकी उत्पादकता, सिंचाई की उपलब्धता, स्थानीय भूमि मूल्य और उसकी आर्थिक उपयोगिता को ईडब्ल्यूएस पात्रता का मुख्य आधार बनाया जाना चाहिए।
प्रमाण-पत्र की वैधता: वर्तमान में हर साल प्रमाण-पत्र बनवाने की परेशानी से मुक्ति दिलाने के लिए ईडब्ल्यूएस प्रमाण-पत्र की वैधता अवधि को बढ़ाकर 3 से 5 वर्ष किया जाना चाहिए।
केंद्रीय सेवाओं में मान्यता: राज्य सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले ईडब्ल्यूएस प्रमाण-पत्र को केंद्र सरकार की सभी सेवाओं और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में बिना किसी अड़चन के मान्यता मिलनी चाहिए।
आयु और शुल्क में छूट: सामान्य वर्ग के गरीब विद्यार्थियों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में आयु सीमा और आवेदन शुल्क में उचित और न्यायसंगत छूट का प्रावधान हो।
विवाहित महिलाओं के लिए सरलीकरण: विवाहित महिलाओं के लिए दस्तावेज सत्यापन और आय प्रमाण से जुड़ी जटिल प्रक्रियाओं को पूरी तरह व्यावहारिक बनाया जाए।
शैक्षणिक सुविधाएं और प्रतिनिधित्व: ईडब्ल्यूएस विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, विशेष छात्रावास और पंचायती राज संस्थाओं में इस वर्ग के लिए उपयुक्त प्रतिनिधित्व की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
अपनी इस यात्रा और मुहिम के संदर्भ में सोशल मीडिया पर संदेश साझा करते हुए रविंद्र सिंह भाटी ने लिखा है कि यह कोई रातों-रात शुरू हुआ राजनीतिक शिगूफा नहीं है, बल्कि एक लंबे समय से चली आ रही हकदारों के सपनों की साझा मुहिम है। उन्होंने याद दिलाया कि कुछ समय पूर्व ही पक्ष और विपक्ष के 75 से अधिक विधायकों ने हस्ताक्षर कर मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष को पत्र लिखा था, जिसमें मांग की गई थी कि राजस्थान विधानसभा से ईडब्ल्यूएस सरलीकरण का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाए।
यात्रा की शुरुआत करने से पहले विधायक भाटी ने जसोल धाम पहुंचकर मां माजीसा राणी भटियाणी सा के दरबार में माथा टेका और विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि, खुशहाली और शांति की कामना की। इसके बाद उन्होंने अपने समर्थकों के काफिले के साथ बाड़मेर से इस जन-संवाद यात्रा का विधिवत श्रीगणेश किया।
राजस्थान में पंचायती राज चुनाव की सरगर्मी के बीच रविंद्र सिंह भाटी के इस कदम को एक बड़े राजनीतिक दबाव के रूप में देखा जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में सामान्य और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के युवाओं के बीच भाटी की बढ़ती लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है।
राजस्थान के पश्चिमी जिलों (बाड़मेर, बालोतरा, सांचौर, जोधपुर और जैसलमेर) में ईडब्ल्यूएस वर्ग का एक बड़ा मतदाता समूह है, जो पारंपरिक रूप से बीजेपी या कांग्रेस के पाले में खड़ा नजर आता था। यदि भाटी इस मुद्दे को हवा देने में कामयाब रहते हैं, तो दोनों ही प्रमुख दलों के स्थानीय समीकरण गड़बड़ा सकते हैं।
स्थानीय निकाय चुनावों में जब हर एक वार्ड और पंचायत समिति सीट पर हार-जीत का अंतर बहुत कम होता है, तब युवाओं का यह नया धड़ा किंगमेकर की भूमिका निभा सकता है।
आगामी दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या राज्य सरकार या विपक्ष इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम उठाने के लिए बाध्य होते हैं, या फिर रविंद्र सिंह भाटी की यह 'सरलीकरण यात्रा' राजस्थान के आगामी राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदलकर रख देती है।