बाड़मेर

पिता ने सिखाई घुड़सवारी, बेटे पहुंच गए न्यूजीलैण्ड, जापान, दुबई, इंग्लैण्ड, जानिए पूरी खबर

राजस्थान दिवस विशेष - सामान्य अश्वपालक के बेटों ने घुड़सवारी से बनाई अलग पहचान- पांचों बेटे करते हैं पांच देशों में रेसकोर्स में घुड़सवारी

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Mar 30, 2018
sons of Normal Horse spinach Different identities from Horse riding

मालाणी नस्ल के घोड़ों की लगाम खींचने वालों के हाथ में है इंग्लिश घोड़ों की लगाम

बाड़मेर.पश्चिमी सीमा के गांव रेडाणा के सामान्य किसान को घुड़सवारी का एेसा शौक कि घर में पांच-सात घोड़े पाले और सारी उम्र रेगिस्तान में घोड़ों की दौड़ लगवाई। अपने पांचों बेटों को इतना काबिल बनाया कि वे घोड़े की लगाम हाथ में लेकर इस तरह सरपट दौड़ाते हैं कि देखने वाला दंग रह जाएं। पिता ने यह यह सोचकर बेटों को लगाम थमाई कि वे उसके शौक को जिंदा रखें लेकिन बेटों ने पिता के इस सपने को गर्व बना दिया है। पांचों बेटों ने घुड़सवारी की अपनी काबिलियत के बूते पांच अलग-अलग देश चुने और वहां वे अच्छे घुड़सवार के तौर पर नाम कमा रहे हैं। चार बेटे न्यूजीलैण्ड, इंग्लैण्ड, जापान और दुबई में हैं और पांचवां अमेरिका जाने की तैयारी में है।

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रेडाणा के छुगसिंह राठौड़ को घोड़े पालने और सवारी का जुनून रहा है। घर में पांच- सात घोड़े वर्षाें से रखते हैं। उन्होंने अपने पांचों बेटों जुंजारसिंह,, तेजसिंह, जसवंतसिंह, उपेन्द्रसिंह और बालेन्द्रसिंह को बचपन से ही घुड़सवारी सिखाई। पिता का यह शौक बेटों का भी जुनून बन गया और उन्होंने घुड़सवारी को शौक से आगे बढ़कर जीवन में नाम कमाने का सपना बना लिया।

दुबई से हुई जिंदगी शुरू

2006 में छुगङ्क्षसह के बड़े बेटे जुंझारसिंह ने दुबई में घुड़सवारी शुरू की। उसके बाद एक-एक कर पांचों भाई वहां चले गए। वे दुबई के शेख परिवार के पास घुड़सवारी कर रहे थे। साथ ही तय कर लिया कि अब कुछ अलग करने के लिए सभी अलग-अलग देशों में जाएंगे और वहां गांव का नाम रोशन करेंगे । फिर क्या था, जुंजारसिंह जापान, तेजङ्क्षसह दुबई, जसवंसिंह इंग्लैण्ड, उपेन्द्रसिंह न्यूजीलैण्ड पहुंच गए। अब सबसे छोटे बालेन्द्रसिंह की अमेरिका जाने की तैयारी है।
यहां मालाणी वहां अरबी और इंग्लिश में दौड़

इंग्लैण्ड और दुबई में घुड़सवारी कर रहे जसवंतसिंह बताते हैं कि यहां पर मालाणी नस्ल के घोड़ों के साथ रेगिस्तान में सरपट घुड़सवारी की। दुबई में शेख परिवार के साथ सभी ने काबिलियत दिखाई तो अलग-अलग देशों में पहुंचने का अवसर मिला। विदेशों में अरबी व इंग्लिश घोड़ों को साधना पड़ा। पिता ने जो सपना हमें दिखाया था उसको पूरा किया। यह ख्वाब था कि गांव का नाम रोशन करें और एेसा करें कि घुड़सवारी के हमारे शौक में कुछ अलग हो।

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Published on:
30 Mar 2018 11:00 am
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