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मानसून 2026 का पूर्वानुमान: इस साल राजस्थान में बारिश के सुकाल या अकाल का संकेत? कुल्हड़, परछाई और पक्षियों से चलेगा पता

Akshaya Tritiya: प्रकृति के अन्य संकेत भी उतने ही महत्वपूर्ण माने जाते हैं। सुबह कोयल की मधुर आवाज शुभ मानी जाती है। कौवा या उल्लू की आवाज को अशुभ संकेत माना जाता है।

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Monsoon 2026 Prediction

आखा तीज पर परंपरागत राजस्थानी वेशभूषा में नजर आएंगे किसान (फोटो: पत्रिका)

Monsoon 2026 Prediction: अक्षय तृतीया आखातीज के पावन अवसर पर सोमवार को शगुन विचारे जाएंगे। प्रकृति के संकेतों के आधार पर आने वाले वर्ष के सुकाल (समृद्धि) और दुकाल (कठिन समय) का अनुमान लगाएंगे। आधुनिक मौसम विज्ञान के दौर में भी ये मान्यताएं किसानों के निर्णयों पर गहरा प्रभाव डालती हैं।

परछाई से भविष्य का संकेत

अक्षय तृतीया के दिन दोपहर में एक थाली में पानी भरकर सूर्य की परछाई देखी जाती है। ग्रामीण मान्यता के अनुसार परछाई का रंग आने वाले समय का संकेत देता है।

सफेद (धवल) छवि: अच्छी वर्षा और समृद्धि
लाल रंग: संघर्ष और अशांति
नीला या पीला: फसलों में रोग और महंगाई
काली छाया: अकाल का संकेत

पंछियों और हवा के संकेत

प्रकृति के अन्य संकेत भी उतने ही महत्वपूर्ण माने जाते हैं । सुबह कोयल की मधुर आवाज शुभ मानी जाती है। कौवा या उल्लू की आवाज को अशुभ संकेत माना जाता है । पश्चिमी या उत्तर-पश्चिमी हवा अच्छी बारिश और भरपूर फसल का संकेत देती है। तेज और शुष्क हवा आने वाले संकट की चेतावनी मानी जाती है ।

किसानों के फैसलों पर असर

इन शगुन के आधार पर यह भी आकलन किया जाता है कि चौमासे के किस महीने में अधिक वर्षा होगी और कौन-सी फसल बोना लाभदायक रहेगा । सुबह घर से निकलते समय मोर, तोता या सफेद पक्षी का दिखना समृद्धि का संकेत माना जाता है ।

कुल्हड़ों से मानसून का अनुमान

एक विशेष परंपरा के तहत पांच मिट्टी के कुल्हड़ों में पानी भरकर उन्हें आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आसोज महीनों से जोड़ा जाता है, जबकि पांचवां ‘थंब’ माना जाता है । पूजा-अर्चना के बाद इन कुल्हड़ों में ऊन के धागे डाले जाते हैं । जो कुल्हड़ पहले फूटता है, उस महीने में अधिक वर्षा होने का अनुमान लगाया जाता है । साथ ही पास में रखे गेहूं, धान और बाजरे जैसे अनाज भी संकेत देते हैं कि किस फसल का उत्पादन बेहतर रहेगा ।

परंपराएं मानसिक भरोसा देती

आज के समय में मौसम का मिजाज बदल रहा है, लेकिन फिर भी ये परंपराएं हमें मानसिक भरोसा देती हैं और खेती की योजना बनाने में सहायक होती हैं ।
– गणपत भंवराणी, पूनियों का तला