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कार्तिक माह में धन संपत्ति दिला सकता है पुरुष सूक्तम का पाठ

आस्था और पूर्ण मनोयोग करना चाहिए पुरुष सूक्तम का पाठ, कार्तिक माह में बहुत शुभ फलदायक, साधक को दिला सकता है सभी सुख
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Updated: 27 Oct 2026, 5:16 PM IST
विष्णुजी
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कार्तिक माह प्रारंभ हो गया है। यह श्री हरि का प्रिय माह है। कार्तिक माह में पुरुष सूक्तम पाठ का विशेष महत्व है। इससे विष्णुजी आराधना की जाती है। आस्था और पूर्ण मनोयोग से किया गया पुरुष सूक्तम का पाठ बहुत शुभ फलदायक होता है। यह साधक को धन संपत्ति दिला सकता है।

ज्योतिषाचार्य पंडित सोमश परसाई बताते हैं कि पुरुष सूक्तम में 16 मुख्य श्लोकों से भगवान की वंदना की गई है। सनातन धर्म में पूजा पाठ में इस सूक्त का पाठ किया जाता रहा। पुरुष सूक्त सभी धार्मिक कर्म-काण्ड और अनुष्ठानों का महत्त्वपूर्ण अंग है।

दिला सकता है त्वरित परिणाम

ज्योतिषाचार्य पंडित नरेंद्र नागर बताते हैं कि कार्तिक माह में पुरुष सूक्त का पाठ त्वरित परिणाम दिला सकता है। आस्था पूर्वक किए गए पाठ से मनोरथ जरूर पूरा होता है। भगवान विष्णु के विग्रह या चित्र के समक्ष देशी घी का दीप जलाकर पुरुष सूक्तम का पाठ करना चाहिए।

पुरुष सूक्तम सर्वाधिक लोकप्रिय स्तुतियों में मानी जाती है। यह भगवान विष्णु को समर्पित है। पुरुष सूक्त का ऋग्वेद में उल्लेख है। इसमें सूक्त को परम पुरुष को समर्पित किया गया है। पुरुष सूक्त ऋग्वेद के 10वें मण्डल का 90वां सूक्त है।

पुरुष सूक्त

॥ अथ शुक्लयजुर्वेदीय पुरुषसूक्तः ॥
हरिः ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।

स भूमिं सर्वत स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥1॥

पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्।

उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥2॥

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः।

पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥3॥

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः।

ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि॥4॥

ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः।

स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥5॥

तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्।

पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये॥6॥

तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे।

छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥7॥

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः।

गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥8॥

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः।

तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥9॥

यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।

मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादा उच्येते॥10॥

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥11॥

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।

श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत॥12॥

नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।

पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँऽकल्पयन्॥13॥

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत।

वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥14॥

सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः।

देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम्॥15॥

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।

ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥16॥

॥ इति शुक्लयजुर्वेदीयपुरुषसूक्तं सम्पूर्णम् ॥

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27 Oct 2026, 5:16 PM IST
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