
राजस्थान की राजनीति के भरतपुर संभाग से दिलचस्प और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है, जहां भरतपुर-धौलपुर-डीग जाट आरक्षण संघर्ष समिति से जुड़कर प्रमुखता से जाट आरक्षण आंदोलन की कमान संभालने वाले किसान नेता नेमसिंह फौजदार ने आधिकारिक तौर पर एक बार फिर कांग्रेस पार्टी में वापसी कर ली है। पिछले कुछ दिनों से वे पूर्व राजपरिवार के सदस्य और वरिष्ठ नेता विश्वेंद्र सिंह के बयानों के बाद लगातार राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में बने हुए थे। चूंकि पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने हाल ही में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाए थे, ऐसे में नेमसिंह फौजदार की इस नाटकीय कांग्रेस में एंट्री को उसी सियासी घटनाक्रम और समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है।
पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने नेमसिंह फौजदार को औपचारिक रूप से कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण करवाई। हालांकि इस राजनीतिक फेरबदल पर कांग्रेस के स्थानीय पदाधिकारियों या जिलाध्यक्षों ने आधिकारिक रूप से कुछ भी बोलने से स्पष्ट इनकार कर दिया है, लेकिन आगामी पंचायती राज और स्थानीय निकाय चुनावों के मुहाने पर फौजदार की यह घर वापसी राजनीतिक गलियारों में खासी चर्चा का विषय बन चुकी है।
नेमसिंह फौजदार की वापसी के पीछे की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो कुछ दिन पहले ही नेमसिंह फौजदार ने पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा से मुलाकात की थी। इस मुलाकात के तुरंत बाद पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान नेमसिंह फौजदार को लेकर तीखी टिप्पणी की थी, जिसके बाद दोनों पक्षों के समर्थकों और नेताओं के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तीखी टिप्पणियों का दौर शुरू हो गया था।
सोशल मीडिया के मंचों से भड़का यह वैचारिक विवाद धीरे-धीरे तूल पकड़ते हुए प्रदेश स्तर के बड़े नेताओं तक जा पहुंचा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जाट आरक्षण संघर्ष समिति के जरिए क्षेत्र के युवाओं और किसानों के बीच मजबूत पकड़ रखने वाले नेता को पार्टी में शामिल करना कांग्रेस की एक सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा है, ताकि जमीनी स्तर पर विरोधी बयानों और ध्रुवीकरण के असर को थामा जा सके।
वहीं, नेमसिंह फौजदार का इस पूरे घटनाक्रम पर कहना है कि तमाम राजनेता पार्टी की मूल रीति-नीतियों और विचारधारा से प्रभावित होकर ही दल बदलते हैं, और वे तो शुरू से ही कांग्रेस की विचारधारा के करीब रहे हैं।
नेमसिंह फौजदार का चुनावी और राजनीतिक सफर काफी लंबा और अलग-अलग दलों के बीच सफर करने वाला रहा है, जिसने उन्हें भरतपुर और आसपास के इलाकों में एक चर्चित चेहरा बनाया है
छात्र राजनीति से शुरुआत: वर्ष 1998 में उन्होंने एनएसयूआई (NSUI) के टिकट पर छात्रसंघ अध्यक्ष पद का चुनाव लड़कर अपने सियासी सफर का आगाज किया था।
स्थानीय निकाय चुनाव: वर्ष 2000 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जिला परिषद का चुनाव लड़ा, जबकि वर्ष 2005 में वे मैदान में निर्दलीय उतरे और अपनी ताकत दिखाई।
विभिन्न दलों से चुनाव: वर्ष 2003 में डीग विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी, वर्ष 2008 और 2013 में नगर विधानसभा सीट से क्रमशः राजस्थान विकास पार्टी और समाजवादी पार्टी के टिकट पर वे चुनावी मैदान में ताल ठोक चुके हैं। इसके अलावा वर्ष 2015 में वे कांग्रेस के समर्थन से जिला परिषद सदस्य भी निर्वाचित हुए थे।
भाजपा और अन्य दल: अपने राजनीतिक सफर के दौरान उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन भी थामा और भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश प्रवक्ता की जिम्मेदारी संभाली। हालांकि, नगर सीट से टिकट न मिलने के कारण वे बागी हो गए और वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) तथा आरएलपी (RLP) के गठबंधन के साझा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था।
अब एक बार फिर कांग्रेस के पाले में लौटने के बाद नेमसिंह फौजदार का यह कदम आगामी पंचायती राज चुनावों में कितना असरदार साबित होता है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल इस एंट्री ने भरतपुर की सियासत में नया रोमांच जरूर पैदा कर दिया है।
भरतपुर की राजनीति में पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह (भरतपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य) और किसान नेता व जाट आरक्षण संघर्ष समिति के संयोजक नेमसिंह फौजदार के बीच का रिश्ता 'गुरु-शिष्य' से शुरू होकर घोर राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और विवाद' में बदलने का एक लंबा इतिहास रहा है।
शुरुआत: मार्गदर्शक (गुरु) और शिष्य का नाता
विश्वेंद्र सिंह और नेमसिंह फौजदार के रिश्ते की शुरुआत बेहद सकारात्मक थी। विश्वेंद्र सिंह स्वयं सार्वजनिक रूप से यह दावा कर चुके हैं कि भरतपुर-धौलपुर जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान नेमसिंह को उन्होंने ही राजनीति की मुख्यधारा में आगे बढ़ाया, नेता बनाया और आंदोलन का झंडा सौंपा था।
मुकदमों से संरक्षण: 1990 और 2000 के दशक में हुए जाट आरक्षण आंदोलनों के दौरान जब नेमसिंह फौजदार पर कानूनी संकट आया, तब तत्कालीन विधायक/सांसद रहते हुए विश्वेंद्र सिंह ने आंदोलन के मुकदमों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली थी, ताकि नेमसिंह के खिलाफ कोई कड़ी कानूनी कार्रवाई न हो सके।
वक्त के साथ नेमसिंह फौजदार ने भरतपुर की स्थानीय राजनीति (विशेषकर डीग जिले के नगर विधानसभा क्षेत्र) में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना शुरू किया।
नेमसिंह का बार-बार दल बदलना: नेमसिंह फौजदार ने अपने राजनीतिक सफर में कई बार अलग-अलग पार्टियों का दामन थामा (जैसे समाजवादी पार्टी, भाजपा, राजस्थान विकास पार्टी और आजाद समाज पार्टी)।
टिकट और प्रभाव की जंग: नेमसिंह फौजदार लंबे समय से नगर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ते रहे हैं, लेकिन उन्हें कभी कांग्रेस या भाजपा से आधिकारिक टिकट नहीं मिल पाया। वहीं, भरतपुर जिले की राजनीति पर पूर्व राजपरिवार (विश्वेंद्र सिंह) का हमेशा से मजबूत एकाधिकार रहा है। जब नेमसिंह ने अपनी स्वतंत्र ताकत दिखानी शुरू की, तो दोनों के बीच राजनीतिक टकराव की स्थिति बन गई।
दोनों नेताओं के बीच का पुराना मनमुटाव तब खुलकर सामने आ गया जब नेमसिंह फौजदार ने भरतपुर में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल को आमंत्रित कर एक बड़ी 'जाट हुंकार सभा' का आयोजन कर दिया।
महाराज की नाराजगी: भरतपुर के राजनीतिक हलकों में माना गया कि विश्वेंद्र सिंह के प्रभाव वाले क्षेत्र में हनुमान बेनीवाल को लाकर नेमसिंह ने सीधे 'महाराज' के नेतृत्व को चुनौती दी है।
सोशल मीडिया पर वार-पलटवार: इसके बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ सोशल मीडिया पर तीखे वीडियो जारी किए। विश्वेंद्र सिंह ने जहां नेमसिंह पर अनादर करने का आरोप लगाया, वहीं नेमसिंह ने पलटवार करते हुए आरक्षण के मुद्दे और व्यक्तिगत संवेदनशीलता (अपनी माताजी के निधन पर संवेदना न जताने) को लेकर विश्वेंद्र सिंह को घेरा।
इस आपसी घमासान के बीच जब कांग्रेस आलाकमान ने विश्वेंद्र सिंह को एक मामले में नोटिस दिया, तो विश्वेंद्र सिंह की नाराजगी के बावजूद पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने जयपुर में नेमसिंह फौजदार को दोबारा कांग्रेस में शामिल करवा दिया।