भरतपुर

Bharatpur : ‘ये मेरा भाई है…’, 20 साल बाद खोए बबलू को देख बहन की आंखों में आए खुशी के आंसू

Bharatpur : जिस भाई को परिवार ने 20 साल पहले खो दिया था, वह अचानक बहन के सामने खड़ा था। बहन आसमा खातून ने जैसे ही भाई बबलू को देखा, उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े।
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Bharatpur : भरतपुर अपना घर आश्रम से रवाना होने से पहले बबलू (नीली शर्ट) अपने परिजनों के साथ। फोटो पत्रिका

Bharatpur : जिस भाई को परिवार ने 20 साल पहले खो दिया था, वह अचानक बहन के सामने खड़ा था। बहन आसमा खातून ने जैसे ही भाई बबलू को देखा, उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। बबलू शुरुआत में बहन को पहचान नहीं पाया, लेकिन बचपन की बातें साझा की गईं तो यादों का सिलसिला लौट आया। कुछ ही देर में दोनों भाई-बहन एक-दूसरे को पहचान गए। भरतपुर के अपना घर आश्रम में हुआ यह मिलन दो दशक से चले आ रहे इंतजार के खत्म होने की भावुक कहानी बन गया। करीब 20 साल पहले 15 वर्ष की उम्र में बबलू मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के कारण बिना बताए घर से निकल गया था।

इंतजार में माता-पिता नहीं रहें

परिवार ने बेटे को हर जगह तलाश किया, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। समय बीतता गया और बेटे के लौटने की उम्मीद भी कमजोर पड़ती गई। पिता लंबे समय तक उसकी तलाश करते रहे, लेकिन बाद में सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया। कुछ समय बाद मां की भी बीमारी के कारण मौत हो गई।

उपचार के बाद स्थिति में हुआ सुधार

27 फरवरी 2025 को बबलू को सेवर क्षेत्र से रेस्क्यू कर भरतपुर के अपना घर आश्रम लाया गया। यहां सेवा, उपचार और पुनर्वास के दौरान उसकी स्थिति में सुधार हुआ। उसने अपने घर और क्षेत्र से जुड़ी कुछ जानकारियां दीं, लेकिन पूरा पता नहीं बता पाने के कारण परिवार तक पहुंचना संभव नहीं हो पा रहा था।

सोशल मीडिया पर तस्वीर बनी मिलन की वजह

इसी बीच सोशल मीडिया पर बबलू की तस्वीर उनके परिवार तक पहुंची। भांजे अनीश खान ने तस्वीर अपनी मां आसमा खातून को दिखाई। तस्वीर देखते ही आसमा ने अपने भाई को पहचान लिया। इसके बाद परिवार ने अपना घर आश्रम से संपर्क किया।

बुलंदशहर से आसमा, भाई रुस्तम, भांजे अनीश खान सहित अन्य परिजन भरतपुर पहुंचे। औपचारिकताएं पूरी होने के बाद आश्रम ने बबलू को उनके परिजनों के साथ बुलंदशहर रवाना कर दिया।

भरतपुर का अपना घर आश्रम

भरतपुर का अपना घर आश्रम एक प्रसिद्ध और मानवीय सेवा का प्रमुख केंद्र है। यह बेसहारा, बीमार, लावारिस और मानसिक रूप से विक्षिप्त असहाय लोगों को आश्रय, भोजन, चिकित्सा और सम्मानजनक जीवन प्रदान करने वाली एक गैर-लाभकारी संस्था है। यहां इन जरूरतमंदों को 'प्रभुजी' कहा जाता है। इस संस्था की स्थापना वर्ष 2000 में डॉ. बी.एम. भारद्वाज और उनकी पत्नी डॉ. माधुरी भारद्वाज द्वारा की गई थी।

Updated on:
18 Aug 2026 09:21 pm
Published on:
18 Aug 2026 09:21 pm