कैबिनेट मंत्री प्रेम प्रकाश पांडेय की पहल के बाद अब नगरीय प्रशासन ने नामांतरण शुल्क को पूरी से तरह से समाप्त कर दिया है।
भिलाई. नगर निगम भिलाई और चरोदा के नागरिकों को अब नामांतरण शुल्क नहीं देना पड़ेगा। राज्य में सबसे महंगा नामांतरण शुल्क इन दोनों निकायों में ही था। यहां नगर निगम प्रशासन भूमि, भवन के वर्तमान कलक्टर दर का दस फीसदी नामांतरण शुल्क वसूल करता रहा है। यानी कि रजिस्ट्री के लगभग बराबर नामांतरण शुल्क यहां के लोगों को चुकाना पड़ रहा था।
नामांतरण शुल्क को पूरी तरह से समाप्त कर दिया
इसके कारण लोग जमीन खरीदकर उसकी रजिस्ट्री तो करा लेते थे, लेकिन नामांतरण से कतराते थे। बिलासपुर उच्च न्यायालय के फैसले के बाद निगम प्रशासन ने नामांतरण शुल्क को लेकर नगरीय प्रशासन विभाग से मार्गदर्शन मांगा था। मामला लगभग ९ महीने तक लंबित रहा। कैबिनेट मंत्री प्रेम प्रकाश पांडेय की पहल के बाद अब नगरीय प्रशासन ने नामांतरण शुल्क को पूरी से तरह से समाप्त कर दिया है।
नगर निगम अधिनियम में १० फीसदी नामांतरण शुल्क का कहीं प्रावधान नहीं है। तात्कालीन मध्यप्रदेश के आवास एवं पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव आरसी बैन ने १९९७ में अनापत्ति शुल्क और लीज डीड की जमीन को लेकर सभी नगरीय निकाय/विशेष विकास क्षेत्र प्राधिकरण(साडा) को आदेश जारी किया था, जिसमें यह कहा गया था कि नगर सुधार न्यास अधिनियम १९६० की धारा-१५ में प्रदत्त शक्तियों के तहत आवंटित जमीन को १० वर्ष तक कोई बेच नहीं सकेगा।
भूखंड बेच सकते हैं
१० साल बाद संस्था के अनापत्ति प्रमाण पत्र के पश्चात भूखंड को बेजा जा सकेगा। बाजार मूल्य के बराबर दो प्रतिशत अनापत्ति प्रमाण पत्र का शुल्क लिया जा सकेगा। प्रदेश के दुर्ग, जगदलपुर, अंबिकापुर, बिलासपुर समेत अन्य निगमों में नामांतरण शुल्क निर्धारित है। यहां लीज डीड की जमीन की खरीदी-बिक्री के बाद 500 से 10 हजार रुपए तक नामांतरण शुल्क लगता है। भिलाई और चरोदा निगम में 10 फीसदी की दर से शुल्क वसूल किया जात रहा है जो लगभग एक रजिस्ट्री खर्च के बराबर था।
मेहरबान सिंह सहित अन्य ने उच्च न्यायालय बिलासपुर में नगर निगम भिलाई की ओर से वसूल कर रहे 10 प्रतिशत नामांतरण शुल्क को लेकर जनहित याचिका दायर की थी। याचिका पर मुख्य न्यायधीश टीबी राधाकृष्णन और न्यायधीश शरद गुप्ता की युगल पीठ ने 11 महीने पहले ही फैसला करते हुए इस पर रोक लगा दी थी।
जब भी कोई नगर निगम सीमा क्षेत्र में भूमि या भवन खरीदता है, निगम के दस्तावेजों में उक्त संपत्ति को अपने नाम चढ़वाना होता है। अखबार में सूचना के बाद यह प्रक्रिया पूरी की जाती है। अगर दस लाख की कीमत की प्रॉपर्टी है तो एक लाख रुपए नामांतरण शुल्क देना होता है। इस तरह हर साल निगम क्षेत्र में भूमि, भवन खरीदने वाले सैकड़ों लोग इससे प्रभावित होते रहे हैं।
तब से शहरवासियों से वर्तमान जिला मूल्यांकन समिति के द्वारा जिले के मुद्रांक शुल्क की वसूली के लिए निर्धारित बाजार मूल्य मार्गदर्शक सिद्धांत ((इसे कलेक्टर रेट या गाइडलाइन रेट भी कहा जाता है)) के अनुसार घोषित दर का दस फीसदी नामांतरण शुल्क लिया जा रहा है। जबकि कलक्टर दर भारतीय मुद्रांक शुल्क अधिनियम 1899 ((1899 का सं 2)) की धारा 47 क एवं सहपठित धारा 75 के द्वारा प्रदत्त शक्तियों से निर्मित किया जाता है। इसका एकमात्र उद्देश्य जिले के क्रय-विक्रय पंजीयन के लिए मुद्रांक शुल्क की वसूली के लिए होती है।
क्या अवैध वसूल की गई राशि को लौटाएगा निगम
नगर पालिक निगम अधिनियम में कहीं पर भी नामांतरण शुल्क का उल्लेख नहीं है। बावजूद निगम प्रशासने पिछले 18 साल से जमीन की मूल्य का 10 प्रतिशत अवैध नामांतरण शुल्क वसूलता रहा। अगर प्रमुख सचिव के आदेश २ फीसदी अनापत्ति शुल्क को घटा दिया जाए। तब भी निगम प्रशासन ने लोगों की जेब से ८ फीसदी अतिरिक्त राशि वसूल की है। राजस्व मंत्री प्रेम प्रकाश पांडेय ने बताया कि लोगों की मांग पर शासन ने नामांतरण शुल्क को शून्य कर दिया है। इसका लाभ भिलाई और चरोदा निगम क्षेत्र की जनता को मिलेगा।