
Teejan Bai: एक आवाज, जिसने महाभारत को सिर्फ सुनाया नहीं, बल्कि मंच पर जीवंत कर दिया… वह आवाज अब हमेशा के लिए थम गई है। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। रायपुर स्थित एम्स अस्पताल में रविवार तड़के उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ भारतीय लोककला का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया, लेकिन उनकी कला और संघर्ष की कहानी आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।
परिजनों के अनुसार, डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के करीब 3:15 बजे रायपुर एम्स में निधन हो गया। वे लंबे समय से विभिन्न गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं और उनका इलाज चल रहा था। उनके निधन की खबर सामने आते ही छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश के कला, साहित्य और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। कलाकारों, जनप्रतिनिधियों और हजारों प्रशंसकों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के छोटे से गांव गनियारी से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचने वाली तीजन बाई का जीवन किसी प्रेरक कहानी से कम नहीं था। बचपन गरीबी और अभावों में बीता। उस दौर में पंडवानी को पुरुषों की कला माना जाता था, लेकिन उन्होंने सामाजिक बंदिशों को चुनौती दी और अपनी दमदार आवाज, अभिनय और अनूठी प्रस्तुति से इस लोककला को नई पहचान दिलाई।
बिना किसी औपचारिक शिक्षा के उन्होंने महाभारत की कथाओं को जिस जीवंत शैली में प्रस्तुत किया, वह उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी। उनके मंचन में केवल गायन नहीं, बल्कि अभिनय, संवाद और भावों का अद्भुत संगम देखने को मिलता था, जिसने देश ही नहीं, विदेशों के दर्शकों को भी मंत्रमुग्ध कर दिया।
तीजन बाई ने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया। समाज की आलोचनाएं झेलीं, आर्थिक परेशानियों से लड़ीं, लेकिन कभी अपनी कला का साथ नहीं छोड़ा। उनके इसी समर्पण ने उन्हें लोककला की सबसे बड़ी हस्तियों में शामिल कर दिया। उन्होंने साबित किया कि प्रतिभा किसी परंपरा या बंधन की मोहताज नहीं होती।
छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई के संघर्ष और सफलता की कहानी अब बड़े पर्दे पर दिखाई देने वाली है। उनके जीवन पर एक बॉलीवुड फिल्म बनाई जा रही है, जो उनकी कला, संघर्ष और उपलब्धियों को दर्शकों तक पहुंचाएगी। फिल्म की शूटिंग के लिए कुछ साल पहले मुंबई से पूरी टीम भिलाई के पास स्थित गनियारी गांव पहुंची थी। फिल्म को वास्तविकता से जोड़ने के लिए गांव की एक स्थानीय लड़की को भी इसमें किरदार दिया गया है, जिससे कहानी और अधिक जीवंत नजर आएगी।
फिल्म की टीम ने शूटिंग के दौरान तीजन बाई से मुलाकात भी की थी। उनके जीवन पर फिल्म बनाने के लिए उन्हें एक सम्मानजनक राशि भी दी गई है। फिल्म में तीजन बाई के जीवन के महत्वपूर्ण संघर्षों और उपलब्धियों को दिखाया जाएगा। बताया जा रहा है कि फिल्म में तीजन बाई के जीवन की मुख्य भूमिका बॉलीवुड की एक जानी-मानी अभिनेत्री निभा रही हैं, जो उनके संघर्ष, मेहनत और कला को बड़े पर्दे पर जीवंत करेंगी। इस फिल्म का निर्माण आलिया सिद्दीकी कर रही हैं, जो अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी की पूर्व पत्नी हैं।
यह फिल्म केवल एक कलाकार की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष और जुनून की कहानी है, जिसने एक साधारण गांव की महिला को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। यह फिल्म आने वाली पीढ़ियों को बताएगी कि कैसे तीजन बाई ने अपनी प्रतिभा और मेहनत से छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी को पूरी दुनिया में पहचान दिलाई।
विश्वविख्यात पंडवानी गायिका Teejan Bai का जीवन जितना गौरवशाली रहा, उतना ही संघर्षों से भरा भी रहा। उनके पिता का नाम हुनुकलाल पारधी और माता का नाम सुखवती देवी था। छह भाई-बहनों के इस साधारण परिवार में पली-बढ़ी तीजन बाई ने बेहद कठिन परिस्थितियों में अपनी कला का सफर शुरू किया।
तीजन बाई की छोटी बहन रंभा बाई बताती हैं कि उनका बचपन बेहद अभावों में गुजरा। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार ठीक से खाने और रहने तक की व्यवस्था भी मुश्किल हो जाती थी। इसके बावजूद तीजन बाई के भीतर संगीत के प्रति गहरा लगाव था। गनियारी गांव की मिट्टी में पली-बढ़ी तीजन बाई बचपन से ही गुनगुनाती रहती थीं और यही शौक धीरे-धीरे उनकी पहचान बन गया।
पढ़ाई-लिखाई का अवसर नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने अपने जुनून को कभी कमजोर नहीं होने दिया। पंडवानी गायन के माध्यम से उन्होंने महाभारत की कथा को ऐसे जीवंत अंदाज में प्रस्तुत किया कि देश ही नहीं, विदेशों में भी लोग उनकी कला के दीवाने हो गए। उनकी दमदार आवाज़ और अभिनय शैली ने पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा दिया।
रंभा बाई के अनुसार आज भी परिवार में कोई ऐसा नहीं है जो पंडवानी की उस परंपरा को उसी स्तर पर आगे बढ़ा सके, जिस ऊंचाई तक तीजन बाई ने पहुंचाया। उनका मानना है कि तीजन बाई जैसी संघर्षशील, समर्पित और प्रतिभाशाली कलाकार इस परिवार में शायद पहली और आखिरी पीढ़ी हैं।
रंभा बाई की बातों में एक ओर गर्व झलकता है कि उनकी बहन ने छत्तीसगढ़ की लोककला को पूरी दुनिया में पहचान दिलाई, वहीं दूसरी ओर एक पीड़ा भी है कि उस विरासत को उसी रूप में आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं है। तीजन बाई की कहानी यह साबित करती है कि संघर्ष भरे हालात में भी यदि जुनून और मेहनत हो तो एक साधारण परिवार की बेटी भी पूरी दुनिया में अपनी कला का परचम लहरा सकती है।