
भिलाई. इस्पात नगरी भिलाई में पले-बढ़े युवा वैज्ञानिक दास अजी कामथ का एक अविष्कार इंजन तकनीक के क्षेत्र में क्रांतिकारी साबित होने वाला है। इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सबसे मुश्किल चुनौती समझी जाने वाली इंजिन डिजाइन के क्षेत्र में उन्होंने भविष्य की ऐसी तकनीक विकसित कर ली है, जिसमें एक ही इंजन बिना किसी बदलाव के किसी भी ईंधन से चल सकता है। कामथ की इस तकनीक को दुनिया के 49 देशों में पेटेंट हासिल हो चुका है। बाजार में उतारने के लिए प्रयासरत हैं। भारत सरकार के 'मेक इन इंडिया कार्यक्रम के माध्यम से वे अपनी इजाद की गई इस क्रांतिकारी तकनीक को बाजार में उतारना चाहते हैं।
इंजन से पंप व कम्परेशर भी चलाए जा सकेंगे
आरवीसीआर तकनीक के बाद पेट्रोल इंजन में डीजल और डीजल इंजन में पेट्रोल डालकर आसानी से चलाया जा सकता है।हाइड्रोजन, एलपीजी या डीजल का इस्तेमाल भी सफलतापूर्वक किया जा सकता है। न सिर्फ परिवहन के साधन कार,जीप व अन्य वाहन चलाए जा सकते हैं बल्कि इंजिन तकनीक पर आधारित पंप,कम्प्रेशर व पवन-जल विद्युत उत्पादन के जनरेटर भी ईंधन की उपलब्धता के आधार पर चलाए जा सकते हैं।
भिलाई में पले-बढ़े हैं कामथ
कामथ के पिता कृष्ण दास कामथ भिलाई स्टील प्लांट के शुरुआती दौर के कार्मिकों में से थे। वे रेल एंड स्ट्रक्चरल मिल में थे। कामथ की स्कूली शिक्षा बीएसपी ईएमएमएस सेक्टर-5 और सीनियर सेकंडरी स्कूल सेक्टर-4 में हुई। इन दिनों पुणे में निवासरत हैं। उन्होंने एनआईटी (आरईसी) दुर्गापुर से इंजीनियरिंग की डिग्री ली और मर्चेंट नैवी में मर्कंटाइल मरीन चीफ इंजीनियर रहे। उन्होंने मर्चेंट नेवी का करियर स्वेच्छा से छोड़ दिया और अपना पूरा ध्यान अविष्कार में लगाया।
भविष्य आरवीसीआर का
आज पर्यावरण संरक्षण सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे दौर में रोटो डायनामिक वेरिएबल कम्बंशन रेश्यो (आरवीसीआर) में वाहन की जरूरत और उपलब्धता के आधार पर मिलने वाले ईंधन से से चल सकेंगे। यह भविष्य के लिए क्रांतिकारी तकनीक साबित होगी। कामथ बताते हैं कि पानी जहाज, टैंक, रेल, ऊर्जा उत्पादन, टैंक, बख्तरबंद वाहन, खनन और अर्थ मूविंग उपकरणों सहित उद्योग जगत की जरूरतों को देखते हुए आज ग्लोबल इंजिन का बाजार 500 अरब डॉलर (लगभग तीन लाख करोड़ रुपए)का है। हमारे देश का प्रतिनिधित्व यहां न के बराबर है। इसलिए उनका सपना रहा है कि उनके इस अविष्कार का श्रेय भारत को जाए।
अंतरराष्ट्रीय कसौटियों पर परखा जा चुका है
इस आरवीसीआर तकनीक को अब तक भारत, अमरीका, जापान, चीन, ब्राजील, न्यूजीलैंड और यूरोपियन यूनियन के 28 देशों सहित कुल 49 देशों में पेटेंट हासिल हो चुका है। 2013 राष्ट्रीय प्रतियोगिता में इस तकनीक को स्वर्ण पदक मिला है।
कॉलेज में आया विचार, मिली सफलता
कामथ ने बताया इस तकनीक का विचार उन्हें एनआईटी (आरईसी) दुर्गापुर में पढ़ाई के दौरान आया था। तब से वह इस तकनीक के शोध व विकास (आरएंडडी) पर निरंतर कार्य कर रहे थे। करीब 15 साल के गहन शोध के बाद उन्हें सफलता मिली।