पवित्र माह रमजान का पहला रोजा शुक्रवार को सम्पन
बीगोद।
पवित्र माह रमजान का पहला रोजा शुक्रवार को सम्पन हुआ। शाम को रोजेदार अफ्तार सामग्री खरीदने के लिए उमड़ पड़े। भीषण गर्मी के बाद भी बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोगो ने रोजा रखा। पहला रोजा शुक्रवार को होने से बच्चे भी पीछे नही रहे और कई बच्चों ने भी रोजा रखा।
मौलाना मोहम्मद हारिश ने बताया कि रोजा संयम और सब्र सिखाता है। रोजा सिर्फ भूख-प्यास पर संयम या कंट्रोल का नाम नहीं है। बल्कि हर किस्म की बुराई पर नियंत्रण/संयम यानी कंट्रोल का नाम है। सेहरी से रोजा आरंभ होता है। नीयत से पुख्ता होता है। इफ़्तार से पूर्ण (मुकम्मल) होता है। रोजा ख़ुद ही रखना पड़ता है। वैज्ञानिक दृष्टि से रोजा स्वास्थ्य यानी सेहत के लिए मुनासिब है। मज़हबी नजरिए से रोजा रूह की सफाई है। रूहानी नजरिए से रोजा ईमान की गहराई है। सामाजिक नजरिए से रोजा इंसान की अच्छाई है।
गुनाहों से बचाता है रोज़ा
मरकज़ मस्जिद के इमाम मौलाना अब्दुल वहाब ने बतााया कि रमजान महीना हमें गुनाहों से बचने और भलाई के रास्ते पर चलने की सीख देता है। रोजे सभी मर्द और औरतों पर फर्ज हैं। रोजे के मायने केवल भूखे प्यासे रहना नहीं है। बल्कि खुद को हर उस बात से रोकना है, जिससे किसी को तकलीफ न पहुंचे। जुबान से किसी की बुराई या ऐसी बात न बोले जो किसी को बुरी लगे। हाथों से ऐसे काम न करे जो किसी को तकलीफ पहुंचाए। पैरों से चल उन जगहों पर न जाए जहां गुनाह हो रहे हैं।सिर्फ खुदा की इबादत और अपने गुनाहों की माफी में वक्त को गुजारे एवं घर-परिवार, वतन की सुख शांति व खुशहाली की दुआएं करे। तेज गर्मी में इस बार रोजे होगें फिर भी रोज़ेदारों में उत्साह है।
सबसे सुखद पल इफ्तार का
रमजान माह शुरू होते है गांव,कस्बो व शहरों की फिजाएं बदल जाती है। सायं को रोजेदार इफ्तार सामग्री खरीदने के लिए बाजारों में उमड़ पड़ते है वही घरों में भिन्न-भिन्न प्रकार की चीजें बनाई जाती है। सूरज ढलते ही मग़रिब की अज़ान के साथ सामूहिक रूप से इफ्तार किया जाता है जो रोजे का सबसे सुखद पल होता है।