भीलवाड़ा

भीलवाड़ा में पहली बार कोरोना संक्रमित को दिया प्लाज्मा

एमजीएच ने किया एतिहासिक कार्य

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Aug 30, 2020
Plasma given to corona infected for the first time in Bhilwara

भीलवाड़ा।
महात्मा गांधी चिकित्सालय के डाक्टरों ने शनिवार को एक ओर एतिहासिक कार्य को अंजाम दिया है। डाक्टरों ने अस्पताल में भर्ती कोरोना संक्रमित मरीज को प्लाज्मा थेरेपी दिया है। इसके साथ ही उसे लाइफ सेविंग इंजेक्शन भी लगाया गया है।
एमजीएच के अधीक्षक डॉ. अरुण गौड़ ने बताया कि अस्पताल में भर्ती राजेन्द्र बाहेती नामक व्यक्ति पिछले पांच दिन से अस्पताल में भर्ती है। उसकी हालत गंभीर होने पर वेन्टीलेटर पर ले रखा है। शनिवार को जयपुर से प्लाज्मा थेरैपी मंगवाकर यह उसे चढ़ाया गया। भीलवाड़ा के लि यह पहला प्रयास था जो पूर्णत सफल रहा है। मरीज की इंटरल्यूकिन-6 की जांच करवाई गई जो बढ़ा हुआ है। हालांकि मरीज की स्थिति अभी क्रिटिकल बनी हुई है, लेकिन एमजीएच के डाक्टर हर संभव प्रयास कर रहे है।
गौड़ ने बताया कि कोरोना संक्रमित से ठीक हो चुके लोगों के प्लाज्मा को मरीजों से ट्रांसफ्यूजन किया जाता है। थेरेपी में एटीबॉडी का इस्तेमाल किया जाता है, जो किसी वायरस या बैक्टीरिया के खिलाफ शरीर में बनता है। यह एंटीबॉडी ठीक हो चुके मरीज के शरीर से निकालकर बीमार शरीर में डाल दिया जाता है। मरीज पर एंटीबॉडी का असर होने पर वायरस कमजोर होने लगता है। इसके बाद मरीज के ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है। गौड़ ने प्लाज्मा थेरैपी को इलाज का एक तरीका करार देते हुए कहा कि इसे जादुई गोली की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
क्या होता है प्लाज्मा
कोरोना वायरस से पीडि़त जो लोग अब पूरी तरह से स्वस्थ हो चुके हैं उनके ब्लड में जो एंटीबॉडीज बन जाती हैं उन्हें ही प्लाज्मा कहते हैं। प्लाज्मा थेरेपी से कोरोना वायरस से पीडि़त लोगों का इलाज किया जाता है। इस थेरिपी से ठीक हुए व्यक्ति के ब्लड से एंटीबॉडीज निकालकर कोरोना वायरस से पीडि़त व्यक्ति के शरीर में डाली जाती हैं। इससे कोरोना वायरस से पीडि़त व्यक्ति को ठीक किया जा सकता है। इंसान के खून में 2 चीजें होती हैं, पहली रेड ब्लड सेल, दूसरी वाइट ब्लड सेल, तीसरी प्लेट्लेट्स और चौथी प्लाज्मा। प्लाज्मा खून का तरल यानी लिक्वडि वाला हिस्सा होता है। शरीर में किसी वायरस के आ जाने पर प्लाज्मा ही एंटीबॉडी बनाने में मदद करता है।
खून से प्लाज्मा लेने के दो तरीके
पहला- सेंट्रफ्यिूज तकनीक में 180 मिलीलीटर से 220 मिलीलीटर तक कन्वेंशनल सीरा यानी प्लाज्मा पा सकते हैं।
दूसरा- एफ्ऱेसिस मशीन सेल सेपरेटर मशीन का उपयोग करके। इस तरीके से एक बार में 600 मिलीलीटर प्लाज्मा लिया जा सकता है। किसी डोनर के शरीर से प्लाज्मा लेने के बाद उसे तकरीबन एक साल तक 60 डिग्री सेल्सियस के तापमान में स्टोर करके रखा जा सकता है।

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Published on:
30 Aug 2020 01:02 am
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