भोपाल

पश्चिमी बायपास प्रोजेक्ट पर खर्च होगा ‘328 करोड़’ लीटर पानी, भोपाल के 29 गांवों में हो सकती पानी की किल्लत

Western Bypass Construction: भोपाल पश्चिमी बायपास निर्माण में रोज 4500 किलोलीटर भूजल दोहन से आसपास के 29 गांवों में जलसंकट की आशंका। दो साल में 328 करोड़ लीटर पानी खर्च होगा, कुएं-बोरिंग सूखने और फसलों पर असर पड़ सकता है।
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Updated: 30 Oct 2026, 8:20 AM IST
पश्चिमी बायपास निर्माण, प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- magnific)
पश्चिमी बायपास निर्माण, प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- magnific)

Bhopal news: एमपी के भोपाल शहर में 11 मील के बाद रतनपुर सड़क से फंदा बायपास तक 36.611 किमी के पश्चिमी बायपास निर्माण की वजह से आसपास के गांवों में जलसंकट की स्थिति बन सकती है। प्रोजेक्ट के लिए रोजाना 4500 किलोलीटर पानी की जरूरत बताई जा रही है। ऐसे में दो वर्षों में प्रोजेक्ट के लिए 328 करोड़ लीटर पानी खर्च होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रोजेक्ट के लिए पानी की पूर्ति भूजल से ही होगी। बताया जा रहा है कि रोजाना 45 लाख लीटर पानी जमीन से निकाला जाएगा तो आसपास के कुएं, बोरिंग सूखने के साथ ही फसलों पर भी असर होने की आशंका है। इस प्रोजेक्ट की लागत 2981.65 करोड़ रुपए है।

ऐसे समझें रोजाना पानी की खपत

-सड़क के बेस और सब-ग्रेड निर्माण के लिए 3000 किलोलीटर पानी की खपत होगी।
-धूल नियंत्रण के लिए 1000 केएल पानी छिड़काव में खर्च किया जाएगा।
-श्रमिकों-कर्मचारियों की जरूरत में 500 केएल पानी लगेगा

ऐसे समझें बल्क में जलदोहन का असर

यह प्रस्तावित बायपास मार्ग भोपाल जिले के फंदा क्षेत्र से गुजरता है और इसके दायरे में कुल 29 गांव व कस्बे आते हैं। मुख्य प्रभावित गांवों में रतनपुर, पिपलिया केशो, सेमरी कलां, थुआ खेड़ा, आमला, झगरिया खुर्द, मूंदला, नरेला, खोकरिया, डूबडी और फंदा शामिल है। जिले में पिछले दो दशकों में भूजल स्तर में निरंतर गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2000 से 2020 के बीच प्री-मानसून भूजल स्तर 12.95 मीटर से गिरकर 12 मीटर नीचे और पोस्ट मानसून स्तर 8.5 मीटर से गिरकर4.3 मीटर नीचे पहुंच गया है।

ग्रामीण क्षेत्रों में जहां स्थानीय आबादी खेती और घरेलू उपयोग के लिए भूजल पर निर्भर है, वहां निर्माण कार्यों के लिए बड़े पैमाने पर पानी के उपयोग से जल स्तर और अधिक नीचे जा सकता है। खुद प्रोजेक्ट निर्माण करने वाली एजेंसी को प्रोजेक्ट में पानी की बल्क जरूरत के लिए भूजल दोहन से जलस्तर गिरने की आशंका है। रिपोर्ट में वर्षा जल संचयन संरचनाओं को बनाने का दावा किया गया है।

दिन-रात हैवी ड्यूटी पंपों से पानी खींचने से भूजल स्तर नीचे जाने से पिपलिया केशो, सेमरी कलां, थुआ खेड़ा, फंदा जैसे गांवों के घरेलू कुएं, हैंडपंप और किसानों के बोरवेल सूखने की स्थिति बन सकती है। गेहूं, चना और सोयाबीन की खेती के लिए भूजल पर निर्भर हैं। पानी न मिलने से हजारों एकड़ में फैली फसलें सूख जाएंगी। - डॉ. सुभाष सी पांडेय, पर्यावरणविद्

Updated on:
30 Oct 2026, 8:20 AM IST
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