
Bhopal News : जन्म के बाद एक माह एनआइसीयू में भर्ती रहने, मस्तिष्क ज्वर से जूझने और सुनने की क्षमता खोने वाले नौ माह के शिशु अब आवाज की दुनिया में कदम रखेगा। अब आम बच्चों की तरह वह सुनकर प्राकृतिक आवाज को पहचानेगा और बोलना भी सीखेगा।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने शिशु के एक साथ दोनों कानों में कॉक्लियर इम्प्लांट किया है। उनके अनुसार, मध्य भारत में इतनी कम उम्र में दोनों कानों में कॉक्लियर इम्प्लांट का ये पहला सफल केस है। बच्चे को नवीनतम पीढ़ी की कॉक्लियर इम्प्लांट तकनीक के साथ स्मार्टनैव निगरानी प्रणाली से प्रत्यारोपित किया गया।
समय से पहले जन्मे नवजात के मस्तिष्क ज्वर के बाद पता चला कि, वो सुन नहीं पा रहा है। डॉक्टरों ने शीघ्र कॉक्लियर इम्प्लांट का निर्णय लिया। कॉक्लियर इम्प्लांट के साथ स्मार्टनैव निगरानी प्रणाली का इस्तेमाल किया, ताकि सर्जरी के दौरान इससे इलेक्ट्रोड की स्थिति और उसे कॉक्लिया में डालने की प्रक्रिया की तत्काल निगरानी की जा सकी।
सर्जरी करने वाले इएनटी विभाग के प्रो. डॉ. विकास गुप्ता और डॉ. गणकल्याण बहेरा के अनुसार शिशु के उम्र कम होने के बावजूद उपचार को टालना उचित नहीं था। मस्तिष्क ज्वर के बाद कान के कॉक्लिया का हिस्सा धीरे - धीरे कठोर या हड्डी जैसा हो सकता है। अधिक देर करने पर कॉक्लियर इम्प्लांट का इलेक्ट्रोड कान के अंदर डालना कठिन होता और प्रत्यारोपण नहीं हो पाता।
गंभीर से अत्यंत गंभीर सेंसरिन्यूरल हियरिंग लॉस और सामान्य हीयरिंग एड से ठीक से सुन नहीं पाने वाले बच्चों को कॉक्लियर इम्प्लांट किया जाता है। यह सामान्य हियरिंग एड की तरह सिर्फ आवाज को तेज नहीं करता, बल्कि बाहरी आवाज को विद्युत संकेतों में बदलकर कान के अंदर कॉक्लिया से जुड़े श्रवण तंत्र तक भी पहुंचाता है।
इम्प्लांट के बच्चे के उपकरण को सक्रिय कर उसकी प्रोग्रामिंग की जाएगी। इसके बाद नियमित स्पीच थेरेपी दिया जाता है, ताकि बच्चे आवाज पहचानने, शब्द समझने और धीरे-धीरे बोलना व भाषा सीख सके।