
World Brain Stroke Day: अचानक चेहरे का टेढ़ा होना, हाथ-पैर में कमजोरी आना या बोलने में परेशानी होना सामान्य समस्या नहीं, बल्कि मस्तिष्क स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर एक-एक मिनट कीमती होता है। इलाज में देरी होने पर मरीज को जिंदगीभर लकवे के साथ जीना पड़ सकता है। अगर किसी को ब्रेन स्ट्रोक आया तो पहला सवाल यह उठता है कि इलाज के लिए कहां ले जाएं। भोपाल में यह सवाल गंभीर है। विशेषज्ञों के मुताबिक, स्ट्रोक के 95% मरीज विकलांगता के शिकार हो जाते हैं। समय पर इलाज मिले तो यह खतरा कम किया जा सकता है, लेकिन मरीजों को सही अस्पताल पहुंचने और तत्काल उपचार शुरू होने में देरी होती है। सरकारी स्तर पर हमीदिया और एम्स में स्ट्रोक के उपचार की सुविधा है। कई मरीज पहले छोटे अस्पताल जाते हैं। वहां से अन्य अस्पताल में रेफर होने में कीमती समय निकल जाता है।
वहीं प्रदेश के खंडवा जिला अस्पताल में हर माह ब्रेन स्ट्रोक के करीब 60 मरीज सामने आते हैं। इनमें कई मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें लकवा लगने के चार से पांच दिन बाद अस्पताल लाया जाता है। ऐसे में उपचार की संभावनाएं प्रभावित होती हैं और ठीक होने में लंबा समय लग सकता है। विश्व मस्तिष्क दिवस पर चिकित्सकों ने लोगों को बीमारी के लक्षण पहचानने और समय पर उपचार कराने की सलाह दी है।
खंडवा में मेडिसिन विभाग के सह-प्राध्यापक डॉ. मोहित गर्ग के अनुसार, ठंड के मौसम में मस्तिष्क स्ट्रोक के मामले बढ़ने लगते हैं। जिला अस्पताल में प्रतिदिन एक से दो लकवाग्रस्त मरीज भर्ती होते हैं। इनमें अधिकांश मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें कई दिन पहले लकवा हुआ था। समय पर अस्पताल नहीं पहुंचने के कारण उनका उपचार देर से शुरू हो पाता है। उन्होंने बताया कि स्ट्रोक के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए वर्ष 2026 की थीम 'एक्ट नाउ' रखी गई थी। इसका उद्देश्य लक्षण दिखाई देते ही मरीज को अस्पताल पहुंचाना है।
-अचानक चेहरे का एक हिस्सा टेढ़ा होना या सुन्न पड़ना।
-एक हाथ या पैर में कमजोरी आना।
-बोलने या दूसरों की बात समझने में परेशानी होना।
-अचानक धुंधला दिखाई देना या संतुलन बिगड़ना।
-चलते समय लड़खड़ाहट या अचानक तेज चक्कर आना।
-ऐसे में तुरंत एंबुलेंस बुलाएं। इलाज में देरी से मस्तिष्क को स्थायी नुकसान हो सकता है।
वरिष्ठ न्यूरो विशेषज्ञ डॉ. आईडी चौरसिया के अनुसार, स्ट्रोक में शुरुआती समय बेहद अहम है। तत्काल जांच और उचित उपचार से विकलांगता का खतरा कम किया जा सकता है। कुछ मरीजों को रक्त का थक्का घोलने के लिए विशेष इंजेक्शन दिया जाता है, जिसकी कीमत करीब 35 से 40 हजार रुपये है। जांच और इंजेक्शन की व्यवस्था में देरी होने पर उपचार का महत्वपूर्ण समय निकल सकता है। नतीजा 95 प्रतिशत मरीज विकलांग हो जाते हैं।