
अस्पताल का फोटो, प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- magnific)
Guna news: एमपी में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का इससे बड़ा मजाक क्या होगा। 25 लाख रुपए खर्च कर संजीवनी क्लीनिक का भवन बनाया, लेकिन डॉक्टर और स्टाफ की तैनाती नहीं की। भवन खाली पड़ा तो चोरी होने लगी। सरकारी संपत्ति बचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने दूसरे स्वास्थ्य केंद्र को ही यहां शिफ्ट कर दिया। अब एक ही भवन में दो संस्थाएं शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और मुख्यमंत्री संजीवनी क्लीनिक पिछले ढाई साल से पूरी तरह रामभरोसे और जुगाड़ तंत्र के सहारे चल रही हैं।
विडंबना यह कि दोनों संस्थानों में एक भी डॉक्टर नहीं है। इकलौती महिला चिकित्सक के छह महीने के लंबे अवकाश पर जाने के बाद रोजाना आने वाले करीब 150 मरीजों की ओपीडी का पूरा जिम्मा सिर्फ नर्सिंग स्टाफ और तकनीकी अमले के कंधों पर है। उन्हें दवाएं तो मिल जाती हैं, लेकिन बीमारी की जांच और इलाज के लिए जिला अस्पताल का रास्ता दिखा दिया जाता है।
बूढ़ेबालाजी-पुरानी छावनी मार्ग पर बने संजीवनी क्लीनिक के भवन का इस्तेमाल मरीजों को बेहतर सुविधा देने के लिए होना था। लेकिन, स्टाफ की नियुक्ति के बिना यह भवन लंबे समय तक खाली रहा। नतीजा, वहां चोरी की घटनाएं होने लगीं। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने टेकरी रोड पर किराए के भवन में चल रहे शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (यूपीएचसी) को यहां शिफ्ट कर दिया। पहले यूपीएचसी में संविदा पर सेवाएं दे रहे डॉ. रामवीर सिंह रघुवंशी का अनुबंध खत्म हुआ। फिर नियमित डॉक्टर नहीं मिला।
वेतन संबंधी विसंगतियों के कारण पहले पदस्थ डॉक्टर भी नौकरी छोड़ गए। एक संस्था के स्टाफ को दूसरी के काम में लगाकर व्यवस्था चलती रही। ढाई साल में न संजीवनी क्लीनिक का अमला आया, न स्थायी डॉक्टरों की व्यवस्था हुई। अब महिला चिकित्सक डॉ. अमिता राय के छह महीने के चाइल्ड केयर अवकाश पर जाने से डॉक्टर की मौजूदगी भी खत्म हो गई।
पूर्व सीएमएचओ डॉ. रामवीर रघुवंशी के अनुसार, स्वास्थ्य केंद्र के लिए जगह चुनने में चूक हुई। बूढेबालाजी क्षेत्र में पहले से स्वास्थ्य सुविधाएं थीं, जबकि करीब 30 हजार आबादी वाले ईदगाहबाड़ी क्षेत्र में सरकारी स्वास्थ्य केंद्र की जरूरत थी। वहां से जिला अस्पताल दूर है। सरकारी सुविधा के अभाव में झोलाछाप डॉक्टर सक्रिय हैं। उनके मुताबिक, संजीवनी क्लीनिक वहां शुरू होता तो बड़ी आबादी को सीधा लाभ मिलता।
केंद्र में चार नर्सिंग ऑफिसर, दो सपोर्ट स्टाफ, एक एएनएम और एक लैब टेक्नीशियन पदस्थ हैं। ये सभी यूपीएचसी के कर्मचारी हैं। संजीवनी क्लीनिक के नाम पर एक भी कर्मचारी तैनात नहीं है। यानी दो स्वास्थ्य संस्थाओं के नाम पर चल रही व्यवस्था की बुनियाद एक ही केंद्र के सीमित अमले पर टिकी है। मरीजों की परेशानी यह है कि उन्हें स्थानीय स्तर पर डॉक्टर से परामर्श मिलने की उम्मीद रहती है, लेकिन केंद्र पहुंचने पर डॉक्टर नहीं मिलते।
पुरानी छावनी निवासी रामस्वरूप कुशवाह शुगर और बीपी की जांच कराने पहुंचे, लेकिन डॉक्टर नहीं मिले। उनका कहना है कि जब डॉक्टर ही नहीं हैं, तो 25 लाख रुपए की लागत से बने भवन का मरीजों को क्या लाभ ?
जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आरआर माथुर ने स्टाफ की कमी को गंभीर समस्या बताया। उनके अनुसार, पुराने भवन को खाली करने और नए भवन में चोरी की घटनाओं के कारण यूपीएचसी को यहां शिफ्ट करना पड़ा। स्टाफ की पदस्थापना के लिए शासन स्तर पर पत्राचार जारी है। उपलब्ध कर्मचारियों से सेवाएं देने का प्रयास किया जा रहा है। दूसरे जरूरतमंद क्षेत्र में स्वास्थ्य केंद्र स्थानांतरित करने का प्रस्ताव भी भेजा गया है।
Updated on:
29 Oct 2026, 8:43 AM IST
Published on:
29 Oct 2026, 8:43 AM IST
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